
Breaking Today, Digital Desk : भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन कभी-कभी ऐसे मौके भी आते हैं जब परिवार के मुखिया को अपने ही बेटे या बेटी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ता है। यह फैसला जितना मुश्किल होता है, उतना ही राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा होती है।
चौटाला परिवार में कलह:
हाल ही में, हरियाणा की राजनीति के दिग्गज ओम प्रकाश चौटाला ने अपने पोते दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला को पार्टी से निष्कासित कर दिया। यह INLD (इंडियन नेशनल लोकदल) के भीतर सत्ता संघर्ष का परिणाम था। चौटाला परिवार में लंबे समय से खींचतान चल रही थी, जिसका अंत दुष्यंत और दिग्विजय के निष्कासन से हुआ। इसके बाद दुष्यंत ने जननायक जनता पार्टी (JJP) बनाई और हरियाणा की राजनीति में अपनी नई पहचान बनाई।
लालू परिवार की मुश्किलें:
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार का दबदबा रहा है। लेकिन, एक समय ऐसा भी आया जब लालू को अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के खिलाफ सख्त रुख अपनाना पड़ा। तेज प्रताप के बगावती तेवर और पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण उन्हें किनारे कर दिया गया था। हालांकि, बाद में उन्हें वापस पार्टी में शामिल कर लिया गया, लेकिन यह घटना दर्शाती है कि परिवारवाद के बावजूद, पार्टी अनुशासन सर्वोपरि होता है।
मुलायम परिवार में दरार:
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव का परिवार भी ऐसे ही विवादों का गवाह रहा है। अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच की तकरार किसी से छिपी नहीं है। एक समय था जब मुलायम सिंह यादव को अपने बेटे अखिलेश के समर्थन में खड़े होकर शिवपाल को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा था। हालांकि, यह दरार आज भी पूरी तरह से भरी नहीं है।
जब रिश्तों से बड़ी हो जाती है राजनीति:
ये घटनाएं बताती हैं कि राजनीति में कई बार खून के रिश्ते भी पीछे छूट जाते हैं। सत्ता, विचारधारा और पार्टी अनुशासन, ये सब परिवार के रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इन फैसलों से न केवल संबंधित नेताओं के परिवार पर असर पड़ता है, बल्कि पूरे राज्य की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।






