Sliderवायरल न्यूज़

“सास की प्रताड़ना, अब चुप रहने की जरूरत नहीं! दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया अधिकार…

Mother-in-law's harassment, no need to remain silent now! Delhi High Court grants right...

Breaking Today, Digital Desk : शादी के बाद एक लड़की के लिए उसका ससुराल ही उसका नया घर होता है. वह कई सपने लेकर इस रिश्ते में आती है. लेकिन कभी-कभी परिस्थितियाँ इतनी मुश्किल हो जाती हैं कि रिश्तों में कड़वाहट घुलने लगती है. खासतौर पर अगर सास की तरफ से शादीशुदा ज़िंदगी में कुछ ज़्यादा ही दखलंदाज़ी हो.

क्या ऐसे में कोई बहु अपने ससुराल वालों के खिलाफ, खासकर सास के खिलाफ कानूनी कदम उठा सकती है? यह सवाल कई घरों में दबी ज़ुबान में पूछा जाता है. हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसने कई लोगों का ध्यान खींचा है.

“हमेशा बहू से सवाल पूछना, उसका पीछा करना, ताने मारना”… क्या ये जुर्म है?

अक्सर घरों में ऐसा होता है कि सास अपनी बहू की हर बात पर नज़र रखती है – उसने क्या पहना, वह कहाँ गई, किससे बात की, खाना कैसा बनाया. कभी-कभी ये बातें सामान्य सलाह लग सकती हैं, लेकिन जब ये हद से ज़्यादा बढ़ जाती हैं और बहू की ज़िंदगी को नियंत्रित करने की कोशिश करने लगती हैं, तो ये मानसिक प्रताड़ना का रूप ले लेती हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बहू की निजी ज़िंदगी में लगातार दखल देना, हर बात पर सवाल करना, ताने मारना और उसका पीछा करना भी एक तरह की क्रूरता हो सकती है.

हाई कोर्ट ने क्यों कहा, “आपराधिक शिकायत की जा सकती है”?

यह केस एक ऐसे जोड़े का था, जहाँ पत्नी ने आरोप लगाया कि उसकी सास उसकी शादीशुदा ज़िंदगी में लगातार दखल दे रही थी, जिससे उसके पति के साथ उसके रिश्ते खराब हो रहे थे. कोर्ट ने माना कि अगर सास की दखलंदाज़ी इतनी ज़्यादा हो जाए कि पति-पत्नी के रिश्ते में दरार आ जाए और पत्नी को मानसिक रूप से परेशान होना पड़े, तो इसे ‘मानसिक क्रूरता’ माना जा सकता है. ऐसे मामलों में, आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा 498A (पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा महिला के प्रति क्रूरता) के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज की जा सकती है.

इस फैसले का क्या मतलब है?

यह फैसला उन सभी बहुओं के लिए एक उम्मीद की किरण है जो ससुराल में ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रही हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हर छोटी बात पर केस कर दिया जाए, बल्कि यह एक संदेश है कि किसी भी महिला की निजी ज़िंदगी और उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. ससुराल में शांति और सम्मान से जीने का अधिकार हर बहु का है.

कोर्ट ने साफ किया कि पति की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी को ऐसी दखलंदाज़ी से बचाए. अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहता है, तो पत्नी कानूनी रास्ता अपना सकती है. यह फैसला बताता है कि अब रिश्ते सिर्फ भावनात्मक डोर से ही नहीं, बल्कि कानूनी अधिकारों से भी बंधे हैं, जहाँ हर व्यक्ति को गरिमा और सम्मान के साथ जीने का हक है.

क्या रिश्तों को सुधारने का कोई और तरीका नहीं?

कानूनी रास्ता आखिरी विकल्प होता है. कोशिश हमेशा यही होनी चाहिए कि बातचीत से मसले हल किए जाएँ. परिवार के बड़े-बुजुर्गों की मदद ली जा सकती है, या अगर बात बहुत बिगड़ जाए, तो काउंसलर की मदद से भी बात बन सकती है. लेकिन अगर सारे रास्ते बंद हो जाएँ और मानसिक प्रताड़ना असहनीय हो जाए, तो फिर कानून का दरवाज़ा खटखटाना गलत नहीं है.

यह फैसला रिश्तों की संवेदनशीलता को दर्शाता है और बताता है कि हर रिश्ते में आपसी सम्मान और स्पेस कितना ज़रूरी है

 

Related Articles

Back to top button