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क्या दूसरे धर्म के त्योहारों में शामिल होना सच में भाईचारा है, जानें एक मौलाना की राय…

Is participating in festivals of other religions really brotherhood? Know the opinion of a Maulana...

Breaking Today, Digital Desk : अभी त्योहारों का मौसम चल रहा है, और चारों तरफ खुशी का माहौल है। ऐसे में ‘भाईचारे’ और ‘मिल-जुलकर रहने’ की बातें खूब होती हैं। लेकिन, क्या इसका मतलब यह है कि हमें हर धर्म के रीति-रिवाजों और त्योहारों में सीधे तौर पर शामिल हो जाना चाहिए? इसी सवाल पर हाल ही में एक मौलाना साहब ने मुस्लिम युवाओं को एक ख़ास नसीहत दी है, जिस पर सोचना ज़रूरी है।

उनका कहना है कि दूसरे धर्मों के त्योहारों, जैसे दिवाली या होली की रस्मों में सीधा शामिल होना, उसे भाईचारा नहीं कहा जा सकता। उन्होंने समझाया कि भाईचारा निभाना एक अलग बात है और किसी दूसरे धर्म के धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बन जाना दूसरी।

मौलाना साहब ने साफ़ किया कि इस्लाम हमें यह सिखाता है कि हम सभी इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार करें, उनके सुख-दुख में साथ खड़े रहें और उनके प्रति सम्मान रखें। यही असली भाईचारा है। अगर आपके पड़ोसी दिवाली मना रहे हैं, तो आप उनके घर जाकर उन्हें मुबारकबाद दे सकते हैं, उनके साथ मिठाई खा सकते हैं, उनकी खुशी में शामिल हो सकते हैं। यह सब भाईचारे की मिसाल है।

लेकिन, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसी धार्मिक पूजा-पाठ या ख़ास रस्मों का हिस्सा बनना, जहाँ एकेश्वरवाद (एक अल्लाह को मानने) के सिद्धांत से अलग कोई बात हो, वो एक मुसलमान के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने युवाओं को समझाया कि अपनी धार्मिक पहचान और सिद्धांतों को बनाए रखना भी उतना ही ज़रूरी है जितना दूसरों का सम्मान करना।

आजकल सोशल मीडिया और तेज़ी से बदलती दुनिया में कई बार हम बिना सोचे-समझे ऐसी चीज़ों का हिस्सा बन जाते हैं, जिनके गहरे मायने हमें पता नहीं होते। मौलाना का यह संदेश उन सभी युवाओं के लिए है जो अपनी धार्मिक पहचान और आधुनिक दुनिया के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।

यह नसीहत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि भाईचारे का सही मतलब क्या है। क्या यह अपनी पहचान मिटाकर दूसरों जैसा बन जाना है, या अपनी पहचान बनाए रखते हुए दूसरों का सम्मान करना और उनके साथ शांति से रहना है? शायद जवाब दूसरा वाला ही है।

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