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अलोकतांत्रिक’ बनाम सुधार, ग्रेटर बेंगलुरु विधेयक पर कर्नाटक विधानसभा में बयानों के तीर…

Undemocratic' vs reform, war of words in Karnataka assembly over Greater Bengaluru Bill

Breaking Today, Digital Desk : कर्नाटक विधानसभा में ग्रेटर बेंगलुरु गवर्नेंस (संशोधन) विधेयक, 2025 को लेकर सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच तीखी बहस देखने को मिली। भाजपा ने इस विधेयक को “अलोकतांत्रिक” और “असंवैधानिक” करार देते हुए सरकार पर शक्तियों के केंद्रीकरण का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने इसे बेंगलुरु के विकेंद्रीकरण और मजबूती के लिए एक आवश्यक कदम बताया।

यह विधेयक, जिसे बेंगलुरु शहर के विकास के प्रभारी, उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने पेश किया, का मुख्य उद्देश्य शहर के प्रशासन को पांच नए नगर निगमों में विभाजित करना है। साथ ही, एक ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) के कामकाज को स्पष्ट करना है। सरकार का कहना है कि यह संशोधन यह सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है कि GBA इन नए निगमों के कामकाज में हस्तक्षेप न करे।

बहस के दौरान, विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि GBA बनाने का असली मकसद मुख्यमंत्री के हाथों में सत्ता को केंद्रित करना और शहरी स्थानीय निकायों की स्वायत्तता को खत्म करना है। उन्होंने इस विधेयक को शक्तियों के विकेंद्रीकरण की भावना के खिलाफ बताया। भाजपा के कई अन्य विधायकों ने भी इन भावनाओं को दोहराते हुए कहा कि यह विधेयक स्थानीय निकायों को सशक्त करने के बजाय उन्हें कमजोर करेगा।

भाजपा ने विधेयक के नामकरण पर भी आपत्ति जताई। आर. अशोक ने “ग्रेटर बेंगलुरु” के अंग्रेजी नाम के इस्तेमाल को कन्नड़ भाषा का अपमान बताया। इसके अलावा, भाजपा विधायकों ने विधानसभा क्षेत्रों के विभाजन पर भी चिंता व्यक्त की, जिससे जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। कुछ भाजपा नेताओं ने इस विधेयक को बेंगलुरु के संस्थापक केम्पेगौड़ा के दृष्टिकोण के साथ विश्वासघात बताया और चेतावनी दी कि इससे गैर-कन्नड़ भाषी मेयर बन सकते हैं।

इन आरोपों का जवाब देते हुए, उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि विधेयक का उद्देश्य बेंगलुरु के भविष्य पर राजनीति करना नहीं है। उन्होंने सदन को आश्वासन दिया कि सरकार नए निगमों की वित्तीय स्वतंत्रता, कराधान, चुनाव या आरक्षण में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी और 74वां संवैधानिक संशोधन पूरी तरह से सुरक्षित है।

शिवकुमार ने बताया कि ग्रेटर बेंगलुरु गवर्नेंस एक्ट पास होने के बाद कुछ लोगों ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकार निगमों पर नियंत्रण करने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा, “हालांकि अदालत ने जनहित याचिका को स्वीकार नहीं किया, लेकिन भविष्य में किसी भी तरह के भ्रम से बचने के लिए हम यह संशोधन लाए हैं।” शिवकुमार ने इस बात पर जोर दिया कि उनका इरादा यह सुनिश्चित करना है कि मेयर और पार्षदों को संविधान के अनुसार पूर्ण अधिकार प्राप्त हों।

इस विधेयक को लेकर हुई बहस ने कर्नाटक की राजनीति में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है, जिसमें एक तरफ कांग्रेस इसे प्रशासनिक सुधार का एक प्रगतिशील कदम बता रही है, तो वहीं भाजपा इसे सत्ता के केंद्रीकरण की एक अलोकतांत्रिक कोशिश के रूप में देख रही है।

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