
Breaking Today, Digital Desk : तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने उस संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में अपने सदस्य को नामित करने से साफ इनकार कर दिया है, जिसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को पद से हटाने संबंधी विवादास्पद विधेयकों की जांच के लिए बनाया गया है. पार्टी ने इस जेपीसी को एक “तमाशा” करार दिया है.
संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिनों में पेश किए गए इन विधेयकों में यह प्रावधान है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार होता है और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसे अपना पद छोड़ना होगा. इन विधेयकों को जांच के लिए 31 सदस्यीय जेपीसी के पास भेजा गया है, जिसमें लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य शामिल होंगे.
टीएमसी का कड़ा विरोध
टीएमसी ने एक बयान जारी कर कहा, “हम संविधान (130वें संशोधन) विधेयक, 2025 का परिचय के स्तर पर ही विरोध करते हैं, और हमारी राय में जेपीसी एक तमाशा है. इसलिए, हम एआईटीसी की ओर से किसी को भी नामित नहीं कर रहे हैं.” पार्टी का मानना है कि यह विधेयक असंवैधानिक है और सरकार इसे ध्यान भटकाने के लिए एक स्टंट के तौर पर इस्तेमाल कर रही है. टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा कि समिति में सत्ता पक्ष का दबदबा होता है, इसलिए विपक्ष की आवाज़ अनसुनी रह जाती है.
संसद में हंगामा और टकराव
जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में इन विधेयकों को पेश किया, तो सदन में भारी हंगामा हुआ. टीएमसी सांसदों ने विधेयक की प्रतियां फाड़ दीं और उन्हें मंत्री की ओर उछाल दिया, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच धक्का-मुक्की भी हुई.
विपक्ष में भी मतभेद
हालांकि टीएमसी और समाजवादी पार्टी (सपा) ने जेपीसी का बहिष्कार करने का फैसला किया है, लेकिन कांग्रेस इस मुद्दे पर अलग राय रखती दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस का मानना है कि समिति से बाहर रहने पर उनके विचार और आपत्तियां रिकॉर्ड पर नहीं आ पाएंगी. इस मुद्दे पर विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन में दरारें भी नजर आ रही हैं.
सरकार का कहना है कि इन विधेयकों का उद्देश्य राजनीति में नैतिकता लाना है, जबकि विपक्ष इसे केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने की एक चाल बता रहा है.






