
Breaking Today, Digital Desk : दशकों पुराने जख्मों को फिर से कुरेदते हुए, बांग्लादेश ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री की यात्रा के दौरान 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए अत्याचारों के लिए एक बार फिर आधिकारिक माफी की अपनी मांग दोहराई है। इस उच्च-स्तरीय वार्ता ने दक्षिण एशिया के इन दो महत्वपूर्ण राष्ट्रों के बीच अनसुलझे ऐतिहासिक मुद्दों को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है।
पाकिस्तानी उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार की ढाका यात्रा के दौरान, बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि 1971 के नरसंहार के लिए माफी, संपत्तियों का बंटवारा और फंसे हुए पाकिस्तानियों की स्वदेश वापसी जैसे लंबित मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है। हुसैन ने इस बात पर जोर दिया कि इन मुद्दों को सुलझाए बिना एक स्थायी और दूरदर्शी रिश्ते की मजबूत नींव रखना मुश्किल है।
हालांकि, पाकिस्तानी पक्ष ने दावा किया कि इन मुद्दों को पहले ही सुलझाया जा चुका है। विदेश मंत्री डार ने 1974 के त्रिपक्षीय समझौते और पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की ढाका यात्रा के दौरान दिए गए बयानों का हवाला देते हुए कहा कि इन मामलों का दो बार समाधान हो चुका है। दूसरी ओर, बांग्लादेश के विदेश सलाहकार ने डार के इस दावे से असहमति जताते हुए कहा कि अगर मुद्दे सुलझ गए होते, तो वे बार-बार नहीं उठते।
यह महत्वपूर्ण यात्रा एक दशक से भी अधिक समय में किसी पाकिस्तानी विदेश मंत्री की पहली बांग्लादेश यात्रा है। यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हुआ है और नई अंतरिम सरकार के साथ पाकिस्तान अपने संबंधों को सुधारने का प्रयास कर रहा है। शेख हसीना की सरकार के दौरान, 1971 के युद्ध अपराधियों पर चले मुकदमों के कारण दोनों देशों के संबंधों में काफी तनाव आ गया था।
इस बैठक में ऐतिहासिक तनावों के बावजूद, दोनों पक्षों ने व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक समझौते और पांच ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर भी किए गए।
विश्लेषकों का मानना है कि इस मुलाकात पर पड़ोसी देश भारत की भी पैनी नजर है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ उसके पारंपरिक रूप से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार क्षेत्रीय गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है।
भले ही इस वार्ता से कोई ठोस समाधान नहीं निकला हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि 1971 के मुक्ति संग्राम की दर्दनाक यादें आज भी बांग्लादेश की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की राह में एक बड़ी बाधा बनी हुई हैं।




