
Breaking Today, Digital Desk : फेफड़ों का कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसे अक्सर पुरुषों और धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन हाल के वर्षों में यह धारणा बदली है, क्योंकि महिलाओं में, यहाँ तक कि धूम्रपान न करने वाली महिलाओं में भी, फेफड़ों के कैंसर के मामलों में चिंताजनक वृद्धि देखी गई है सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महिलाओं में इस बीमारी के लक्षण अक्सर इतने सामान्य होते हैं कि उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है या किसी दूसरी स्वास्थ्य समस्या का लक्षण मान लिया जाता है, जिससे निदान में खतरनाक देरी होती है.
महिलाओं में क्यों अलग और अस्पष्ट होते हैं लक्षण?
पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर अक्सर फेफड़ों के मुख्य वायुमार्ग को प्रभावित करता है, जिससे लगातार खांसी और सांस लेने में कठिनाई जैसे स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं. इसके विपरीत, महिलाओं में “एडेनोकार्सिनोमा” नामक फेफड़ों का कैंसर अधिक आम है, जो फेफड़ों के बाहरी हिस्सों में विकसित होता है. इस वजह से, शुरुआती लक्षण अक्सर सांस से संबंधित नहीं होते. महिलाओं को थकान, पीठ या कंधे में दर्द, और अचानक वजन कम होने जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं. ये ऐसे लक्षण हैं जिन्हें आसानी से रोजमर्रा की थकान, उम्र बढ़ने या गठिया जैसी समस्याओं के लिए गलत समझा जा सकता है.
शोध बताते हैं कि एस्ट्रोजन, जो एक महिला सेक्स हार्मोन है, भी कुछ प्रकार के फेफड़ों के कैंसर के विकास में भूमिका निभा सकता है.[7] इसके अलावा, रात में अत्यधिक पसीना आना भी महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर का एक लक्षण हो सकता है.गलत निदान का जोखिम
फेफड़ों के कैंसर के कई लक्षण अन्य बीमारियों जैसे तपेदिक (टीबी) और निमोनिया से मिलते-जुलते हैं भारत में टीबी के मामले अधिक होने के कारण, लगातार खांसी, सीने में दर्द और वजन घटने जैसे लक्षणों को अक्सर टीबी मानकर इलाज शुरू कर दिया जाता है.इससे कैंसर का सही निदान महीनों या वर्षों तक टल जाता है, जब तक कि बीमारी एक उन्नत चरण में नहीं पहुंच जाती
जोखिम कारक: सिर्फ धूम्रपान ही नहीं
यह एक बड़ी गलत धारणा है कि फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों को होता है. आंकड़ों से पता चलता है कि फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित 15 से 20 प्रतिशत लोगों ने कभी धूम्रपान नहीं किया होता.महिलाओं में बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण हैं:
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निष्क्रिय धूम्रपान (Passive Smoking): बंद स्थानों और कार्यस्थलों पर सिगरेट के धुएं के संपर्क में आना
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वायु प्रदूषण: घर के अंदर और बाहर बढ़ता प्रदूषण एक प्रमुख जोखिम कारक है. भारत में लगभग 75% परिवार अभी भी खाना पकाने के लिए लकड़ी या गोबर जैसे ठोस ईंधन पर निर्भर हैं, जिसका धुआं खतरनाक है.
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आनुवंशिकी: परिवार में फेफड़ों के कैंसर का इतिहास जोखिम को बढ़ा सकता है
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व्यावसायिक जोखिम: एस्बेस्टस और रेडॉन गैस जैसे हानिकारक पदार्थों के संपर्क में आनासमय पर पहचान ही है बचाव
यह महत्वपूर्ण है कि महिलाएं अपने शरीर में हो रहे बदलावों के प्रति सतर्क रहें. यदि लगातार दो-तीन सप्ताह से अधिक समय तक खांसी, अस्पष्टीकृत वजन घटना, थकान, सांस लेने में तकलीफ या शरीर में दर्द जैसे लक्षण बने रहते हैं, तो डॉक्टर से परामर्श करना महत्वपूर्ण है.शुरुआती पहचान और सही इलाज से फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से भी सफलतापूर्वक लड़ा जा सकता है






