
Breaking Today, Digital Desk : दिवाली के बाद अक्सर हमारे शहरों में धुंध और प्रदूषण बढ़ जाता है, जिसका असर हम सभी पर पड़ता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसका सबसे ज़्यादा खतरा छोटे बच्चों को क्यों होता है? बाल रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चों के शरीर की बनावट और उनकी बढ़ती उम्र उन्हें इस जहरीली हवा के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बनाती है।
छोटे बच्चों के फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं, जिससे वे प्रदूषित हवा में मौजूद कणों को फ़िल्टर करने में उतने सक्षम नहीं होते जितने वयस्क होते हैं। इसके अलावा, उनकी साँस लेने की दर वयस्कों से ज़्यादा होती है, जिसका मतलब है कि वे प्रति मिनट ज़्यादा हवा अंदर लेते हैं। ऐसे में अगर हवा में प्रदूषण ज़्यादा हो, तो उनके शरीर में ज़्यादा हानिकारक कण चले जाते हैं।
पटाखों के धुएं में छोटे-छोटे कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे रसायन होते हैं, जो सीधे साँस की नली और फेफड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमज़ोर होती है, इसलिए वे प्रदूषण के कारण होने वाले संक्रमणों और बीमारियों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं, जैसे कि अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, और फेफड़ों से जुड़े अन्य रोग।
विशेषज्ञों का कहना है कि हमें अपने बच्चों को इस खतरनाक धुएं से बचाना चाहिए। प्रदूषण ज़्यादा होने पर उन्हें घर के अंदर रखें, खिड़की-दरवाज़े बंद रखें और एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल कर सकते हैं।





