
Breaking Today, Digital Desk : भारत की युवा पीढ़ी एक ऐसे छिपे हुए संकट का सामना कर रही है, जो चुपचाप उनके स्वास्थ्य और भविष्य को निगल रहा है – यह संकट है नींद संबंधी विकारों का। बदलती जीवनशैली, पढ़ाई का अत्यधिक दबाव और टेक्नोलॉजी के बढ़ते दखल के बीच, नींद की कमी एक व्यक्तिगत समस्या से बढ़कर एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गई है। विशेषज्ञ इसे एक “मूक महामारी” करार दे रहे हैं, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
एक हालिया अध्ययन के अनुसार, भारत में हर तीन में से एक युवा नींद की समस्या से जूझ रहा है। यह आंकड़ा पिछले 15 सालों में दोगुना हो गया है। दिल्ली में किए गए एक शोध में पाया गया कि हर पांच में से एक किशोर चिकित्सकीय रूप से नींद से वंचित है, और इनमें से 60% में अवसाद के लक्षण दिखाई देते हैं। यह समस्या केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही है।
क्यों नहीं सो पा रहे हैं भारत के युवा?
इस नींद के संकट के पीछे कई कारण छिपे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अकादमिक और सामाजिक दबाव, विशेष रूप से 16 से 24 वर्ष की आयु के बीच, एक प्रमुख कारक है। इसके अलावा, देर रात तक स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग नींद के हार्मोन मेलाटोनिन के उत्पादन में बाधा डालता है, जिससे नींद आने में मुश्किल होती है। कोविड-19 महामारी के बाद से ऑनलाइन रूटीन ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है।
जीवनशैली में बदलाव भी एक बड़ी वजह है। देर रात तक जागना, अनियमित सोने-जागने का समय और कैफीन का अधिक सेवन युवाओं के प्राकृतिक स्लीप साइकिल को बिगाड़ रहा है। कई बार यह समस्या स्लीप एपनिया जैसे गंभीर विकारों का भी संकेत हो सकती है।
नींद की कमी का स्वास्थ्य पर गंभीर असर
नींद की कमी का असर सिर्फ दिन में थकान या सुस्ती तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम काफी गंभीर और दूरगामी हो सकते हैं। पूरी नींद न लेने से याददाश्त और सीखने की क्षमता कम हो जाती है, एकाग्रता में कमी आती है और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। नींद की कमी से चिंता, चिड़चिड़ापन और अवसाद का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या युवाओं में जोखिम भरे व्यवहार को भी बढ़ावा दे सकती है। शारीरिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से, अधूरी नींद मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।
क्या है इस संकट का समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जीवनशैली में कुछ सरल बदलाव लाकर नींद की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। सोने और जागने का एक नियमित समय निर्धारित करना, सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनाना और सोने के लिए एक आरामदायक माहौल तैयार करना, कुछ कारगर उपाय हैं।
इसके अलावा, नियमित व्यायाम और स्वस्थ आहार भी अच्छी नींद के लिए आवश्यक है। यदि नींद न आने की समस्या लगातार बनी रहती है, तो पेशेवर मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (सीबीटी-आई) जैसी तकनीकें बिना दवा के नींद की समस्याओं के इलाज में काफी प्रभावी साबित हो सकती हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि नींद एक विलासिता नहीं, बल्कि एक जैविक आवश्यकता है और इसे प्राथमिकता देना स्वस्थ और सफल जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।






