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झारखंड का राजभवन, सफलता का प्रवेश द्वार, मुर्मू के बाद अब राधाकृष्णन की बारी…

Jharkhand's Raj Bhawan, the gateway to success, after Murmu now it's Radhakrishnan's turn

Breaking Today, Digital Desk : भारतीय राजनीति में कुछ पद ऐसे होते हैं, जो अपने आप में एक मंजिल माने जाते हैं। लेकिन क्या हो जब कोई संवैधानिक पद किसी बड़ी सियासी छलांग का मंच बन जाए? झारखंड का राजभवन कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रहा है। पहले द्रौपदी मुर्मू और अब सी.पी. राधाकृष्णन, यहां के राज्यपालों की किस्मत जिस तरह से चमकी है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या रांची का यह राजभवन वाकई ‘भाग्यशाली’ है या यह एक नई सियासी परंपरा की शुरुआत है।

झारखंड की राज्यपाल के तौर पर द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल 2015 से 2021 तक रहा। वह राज्य की पहली महिला और पहली आदिवासी राज्यपाल थीं, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। उनके शांत और सुलझे हुए कार्यकाल ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दी। इसी का नतीजा था कि 2022 में एनडीए ने उन्हें देश के सर्वोच्च पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया और वह भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में चुनी गईं। यह एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि वह देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनीं।

यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। मुर्मू के बाद राज्यपाल का पद संभालने वाले सी.पी. राधाकृष्णन ने भी बहुत ही कम समय में राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। फरवरी 2023 में झारखंड के राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने के बाद, उन्हें जल्द ही तेलंगाना और पुडुचेरी का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया। इसके तुरंत बाद, उन्हें महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया। और अब, एनडीए ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर एक और बड़ा सियासी दांव खेला है। यदि वह यह चुनाव जीत जाते हैं, तो यह इस बात का एक और प्रमाण होगा कि झारखंड का राजभवन किस तरह राष्ट्रीय राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने में मददगार साबित हो रहा है।

हालांकि, यह कहना कि झारखंड का राज्यपाल बनने वाला हर व्यक्ति राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर पहुंचता है, जल्दबाजी होगी। इस पद पर सैयद सिब्ते रज़ी जैसे नेता भी रहे हैं, जो बाद में असम के राज्यपाल बने, लेकिन उन्हें वैसी राष्ट्रीय प्रमुखता नहीं मिली।

फिर भी, द्रौपदी मुर्मू और सी.पी. राधाकृष्णन के उदाहरण इतने प्रभावशाली हैं कि इन्हें महज संयोग कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इन नियुक्तियों ने एक धारणा को जन्म दिया है कि झारखंड के राजभवन का रास्ता सीधे दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक जाता है। इसके पीछे चाहे कोई सोची-समझी रणनीति हो या महज एक राजनीतिक इत्तेफाक, एक बात तो तय है कि झारखंड का राजभवन अब केवल एक संवैधानिक कार्यालय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षाओं का एक लॉन्चपैड बनता जा रहा है।

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