
Breaking Today, Digital Desk : नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बार फिर समय-सीमा बढ़ा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा तेज हो गई है। बीजेपी इसे एक बड़े राजनीतिक फायदे के तौर पर देख रही है, खासकर आगामी चुनावों को देखते हुए।
पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय एक बड़ा और प्रभावशाली वोट बैंक है। इस समुदाय के लोग बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं, जो लंबे समय से भारतीय नागरिकता का इंतजार कर रहे हैं। बीजेपी ने हमेशा से ही इस समुदाय को सीएए के जरिए नागरिकता दिलाने का वादा किया है। इस वादे को पूरा करने में देरी से मतुआ समुदाय में थोड़ी नाराजगी थी, लेकिन अब समय-सीमा बढ़ने से बीजेपी को उम्मीद है कि वह इस नाराजगी को कम कर पाएगी।
बीजेपी का मानना है कि सीएए को लागू करने से पश्चिम बंगाल में उसे मतुआ समुदाय का पूरा समर्थन मिलेगा। इसके अलावा, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुसूचित जाति (SC) के वोटरों पर भी इसका असर पड़ सकता है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और अन्य विपक्षी दल सीएए का लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि यह कानून भेदभावपूर्ण है और देश की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीएए का मुद्दा पश्चिम बंगाल में एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन सकता है। बीजेपी इसे अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है, जबकि टीएमसी इसे केंद्र सरकार की विभाजनकारी नीति के रूप में पेश कर सकती है। अब देखना यह होगा कि सीएए का यह दांव बीजेपी के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है और पश्चिम बंगाल की राजनीति में इसका क्या असर होता है।






