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सिर्फ नाम का विश्वगुरु या असली, भागवत ने दिया बड़ा संदेश…

Vishwaguru in name only or real, Bhagwat gave a big message...

Breaking Today, Digital Desk : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है, जिसने कई लोगों का ध्यान खींचा है। उन्होंने कहा कि भारत सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने या खुद को ‘विश्वगुरु’ कहने से विश्वगुरु नहीं बन जाएगा, बल्कि इसके लिए हमें अपने अंदर ‘मानवता का दीपक’ जलाना होगा। उनका इशारा साफ था कि दिखावे से ज्यादा आंतरिक बदलाव और मानवीय मूल्यों को अपनाना जरूरी है।

क्या कहा मोहन भागवत ने?

भागवत ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि हमें अपनी संस्कृति और ज्ञान पर गर्व है, लेकिन सिर्फ इस गर्व से काम नहीं चलेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर हम सचमुच दुनिया का नेतृत्व करना चाहते हैं, तो हमें करुणा, प्रेम और सेवा जैसे मानवीय गुणों को अपनाना होगा। उनके मुताबिक, असली विश्वगुरु वही है जो दूसरों के कल्याण के लिए काम करता है, न कि सिर्फ अपनी श्रेष्ठता का बखान करता है।

मानवता का दीपक क्यों जरूरी?

भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश और दुनिया में कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंसा, नफरत और स्वार्थ की भावना बढ़ती जा रही है। ऐसे में ‘मानवता का दीपक’ जलाने की बात बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका मतलब है कि हमें एक-दूसरे के प्रति empathy (सहानुभूति) रखनी होगी, सबका सम्मान करना होगा और मिलकर एक बेहतर समाज बनाना होगा। विश्वगुरु बनने का रास्ता शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि प्रेम और सहयोग से होकर गुजरता है।

संघ के विचारों से कितना मेल खाता है यह बयान?

RSS हमेशा से भारतीय संस्कृति और मूल्यों की बात करता रहा है। भागवत का यह बयान भी उसी कड़ी का हिस्सा माना जा सकता है। उन्होंने एक तरह से याद दिलाया है कि हमारी परंपरा में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (पूरी धरती एक परिवार है) का सिद्धांत रहा है। अगर हम इस सिद्धांत पर चलेंगे, तभी सही मायने में विश्वगुरु बन पाएंगे। यह सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक नारा नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है।

आगे क्या?

मोहन भागवत के इस बयान पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रियाएं आ सकती हैं। कुछ लोग इसे संघ के विचारों में एक सकारात्मक बदलाव के तौर पर देख सकते हैं, वहीं कुछ इसे सिर्फ एक बयानबाजी भी मान सकते हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि उनके इस बयान ने एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है कि एक राष्ट्र के रूप में हम किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं – सिर्फ आर्थिक और सैन्य शक्ति के दम पर, या मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिकता के साथ?

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