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याल्टा 2.0 का डर, अलास्का की बैठक के बाद क्यों सहमा हुआ है यूरोप…

Fear of Yalta 2.0, why is Europe scared after the Alaska meeting

Breaking Today, Digital Desk : अलास्का में जमी बर्फ शायद पिघल गई हो, लेकिन वहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई मुलाकात ने दुनिया की राजनीति में जो ठंडक घोली है, उसकी सिहरन अब वाशिंगटन डीसी तक महसूस की जा रही है. पिछले अपमान को पीछे छोड़, यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की एक बार फिर व्हाइट हाउस में हैं. लेकिन इस बार वो अकेले नहीं हैं; उनके साथ यूरोप के बड़े नेताओं का एक दल है, जो यह समझने की कोशिश कर रहा है कि अलास्का की उस बंद कमरे में हुई बातचीत का असली मतलब क्या था.

यह महज़ एक मुलाक़ात नहीं, बल्कि एक बेहद जोखिम भरा दांव है. ज़ेलेंस्की के लिए यह अपने देश की संप्रभुता और भविष्य को बचाने की लड़ाई है. यूरोप के लिए यह डर है कि कहीं दो ताक़तें मिलकर उनके महाद्वीप का भविष्य न तय कर दें, ठीक वैसे ही जैसे 1945 के याल्टा सम्मेलन में हुआ था. और ट्रंप के लिए यह ख़ुद को एक ऐसे “डीलर” के रूप में साबित करने की परीक्षा है, जो उस युद्ध को ख़त्म कर सकता है जिसे उन्होंने एक दिन में सुलझाने का दावा किया था.

अलास्का में क्या हुआ?

अलास्का के जॉइंट बेस एल्मेंडॉर्फ-रिचर्डसन में जब ट्रंप और पुतिन मिले, तो दुनिया की नज़रें उन पर टिकी थीं. लगभग तीन घंटे तक चली बातचीत के बाद, दोनों नेताओं ने इसे “बेहद उत्पादक” बताया, लेकिन नतीजा कुछ ख़ास नहीं निकला. कोई युद्धविराम नहीं, कोई ठोस समझौता नहीं, बस अस्पष्ट बयानों की एक शृंखला. पुतिन बिना कोई रियायत दिए एक विजेता के तौर पर उभरे, जबकि ट्रंप की रणनीति विफल होती दिखी. विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक पुतिन के लिए एक प्रतीकात्मक जीत थी, जिसने रूस की स्थिति को और मजबूत कर दिया. सबसे बड़ी चिंता की बात यह थी कि इस बातचीत से यूक्रेन को पूरी तरह बाहर रखा गया था, जिससे पश्चिमी देशों में यह सवाल खड़ा हो गया कि क्या ट्रंप ने पुतिन को यूक्रेन के कब्ज़े वाले क्षेत्रों पर अप्रत्यक्ष वैधता दे दी है.

वाशिंगटन की चुनौती

अब गेंद वाशिंगटन के पाले में है. अलास्का बैठक के बाद ट्रंप के बदलते बयानों ने कीव और यूरोपीय राजधानियों में खतरे की घंटी बजा दी है. ट्रंप ने तत्काल युद्धविराम की मांग करने के बजाय “स्थायी शांति समझौते” की बात शुरू कर दी, जिससे संकेत मिलता है कि वे क्षेत्रीय रियायतों के लिए तैयार हो सकते हैं. उन्होंने ज़ेलेंस्की के आने से कुछ घंटे पहले ही क्रीमिया की वापसी की किसी भी उम्मीद को खारिज कर दिया और चेतावनी दी कि यूक्रेन किसी भी सौदे के तहत नाटो में शामिल नहीं होगा.

इसी अनिश्चितता के बीच ज़ेलेंस्की अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ वाशिंगटन पहुंचे हैं. उन्हें अब एक ऐसी महीन रेखा पर चलना होगा, जहाँ उन्हें ट्रंप को नाराज़ किए बिना यूक्रेन का पक्ष मजबूती से रखना है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर जैसे नेताओं ने उन्हें टकराव के बजाय ट्रंप की सराहना करने की सलाह दी है, यह जानते हुए कि अमेरिकी राष्ट्रपति सम्मान के भाव पर अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं. यूरोप और यूक्रेन यह सुनिश्चित करने के लिए दौड़-धूप कर रहे हैं कि अमेरिका का कोई भी कदम यूक्रेन को अलग-थलग न कर दे या उसे अपनी रक्षा की ज़मीन छोड़ने पर मज़बूर न कर दे.

यह वार्ता इस बात की परीक्षा है कि क्या आज की दुनिया में कूटनीति सिर्फ दिखावे के बजाय सिद्धांतों पर टिकी रह सकती है. जैसे-जैसे दुनिया देख रही है, सवाल बना हुआ है: क्या यह शांति की दिशा में एक कदम है, या एक ऐसी बड़ी रियायत जिसकी पटकथा बहुत सावधानी से लिखी गई है? यूक्रेन का भविष्य और यूरोप की सुरक्षा का दांव इसी पर लगा है.

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