
Breaking Today, Digital Desk : भारत और चीन, दो ऐसे एशियाई महाशक्ति जिनके हर कदम पर दुनिया की निगाहें टिकी होती हैं। इनके रिश्ते हमेशा से ही जटिलताओं और संभावनाओं से भरे रहे हैं। हाल के दिनों में सीमा पर तनाव कम करने और व्यापारिक संबंधों को फिर से पटरी पर लाने के कुछ संकेत मिले हैं, जिससे यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या दोनों देशों के बीच महीनों से जमी बर्फ पिघल रही है? क्या यह दरार को भरने की एक गंभीर कोशिश है, या फिर यह शांति किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी है—एक ऐसी रणनीतिक चाल जिसमें दोनों पक्ष अपनी अगली तैयारी को और मजबूत कर रहे हैं
मौजूदा दौर में भारत और चीन के रिश्ते एक ऐसे अनिश्चित चौराहे पर खड़े हैं, जहां भविष्य की राह धुंधली नजर आती है। लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर दो साल पहले हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के बीच विश्वास की जो खाई पैदा की है, वह लगातार चौड़ी होती जा रही है। सैन्य स्तर पर कई दौर की बातचीत के बावजूद, सीमा पर तनाव पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। चीन की सेना (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) अभी भी कई महत्वपूर्ण जगहों पर जमी हुई है, जो भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।
यह तनाव सिर्फ सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। इसका असर दोनों देशों के आर्थिक और व्यापारिक संबंधों पर भी साफ दिख रहा है। भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कई चीनी मोबाइल ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया है और चीनी निवेश की जांच को भी सख्त कर दिया है। ये कदम चीन पर अपनी निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भर बनने की भारत की कोशिशों का हिस्सा हैं। हालांकि, यह भी एक सच्चाई है कि चीन अब भी भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक बना हुआ है, जो इस रिश्ते की जटिलता को और बढ़ाता है।
कूटनीतिक मोर्चे पर भी एक तरह की खामोशी छाई हुई है। दोनों देशों के नेता सार्वजनिक मंचों पर तो मिलते हैं, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में पुरानी गर्मजोशी नदारद है। चीन का पाकिस्तान के साथ गहराता रिश्ता और हिंद महासागर में उसकी बढ़ती सैन्य मौजूदगी भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां खड़ी कर रही है। वहीं, भारत का अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘क्वाड’ समूह में सक्रिय होना चीन को खटकता है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह भारत-चीन संबंधों में एक स्थायी दरार है या फिर यह सिर्फ एक रणनीतिक विराम है, जिसके बाद हालात सामान्य हो सकते हैं? विश्लेषकों का मानना है कि जब तक सीमा विवाद का कोई स्थायी और संतोषजनक समाधान नहीं निकलता, तब तक संबंधों में पूरी तरह से सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा। चीन का अड़ियल रवैया और भारत का अपने हितों की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प, इन दोनों के बीच संतुलन साधना ही भविष्य की दिशा तय करेगा। फिलहाल, दोनों देश एक-दूसरे की चालों का इंतजार कर रहे हैं, और यह ‘रणनीतिक विराम’ कब तक चलेगा, यह कहना मुश्किल है।




