महाराष्ट्र में “सैयारा” का दबदबा, क्या बॉलीवुड की चमक में फीकी पड़ रही है मराठी फिल्में…
"Saiyaara" dominates Maharashtra Are Marathi films getting overshadowed by Bollywood's sheen

Breaking Today, Digital Desk : मोहित सूरी के निर्देशन में बनी हिंदी फिल्म “सैयारा” बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन कर रही है, लेकिन इसकी सफलता ने महाराष्ट्र में एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। आरोप लग रहे हैं कि “सैयारा” को अधिक स्क्रीन देने के लिए मराठी फिल्म “येरे येरे पैसा 3” को थिएटरों से हटाया जा रहा है। इस घटना ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या महाराष्ट्र में क्षेत्रीय सिनेमा को हिंदी फिल्मों के विशालकाय बजट और प्रभाव के कारण दरकिनार किया जा रहा है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेता अमेय खोपकर ने आरोप लगाया कि उनकी मराठी फिल्म “येरे येरे पैसा 3” को अच्छी प्रतिक्रिया मिलने के बावजूद कई स्क्रीनों से हटा दिया गया और उसकी जगह “सैयारा” को दे दी गई।[3] खोपकर ने मल्टीप्लेक्स मालिकों पर बड़े बैनर की फिल्म को प्राथमिकता देने का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी कि अगर मराठी फिल्मों के साथ ऐसा व्यवहार जारी रहा तो मनसे अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन करेगी।
आंकड़ों पर नजर डालें तो “सैयारा” ने अब तक 175 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार कर लिया है, जबकि ‘येरे येरे पैसा 3’ ने लगभग 78 लाख रुपये की कमाई की है। यह वित्तीय असमानता वितरकों और थिएटर मालिकों के फैसलों को प्रभावित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महाराष्ट्र में हिंदी फिल्में सालाना लगभग 1200 करोड़ रुपये का कारोबार करती हैं, जबकि मराठी फिल्मों का बाजार लगभग 100 करोड़ रुपये का है।
इस विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि “सैयारा” को जगह देने के लिए “येरे येरे पैसा 3” को दरकिनार करना एक आम बात हो गई है और मराठी के लिए लड़ाई को तेज करने की जरूरत है।वहीं, राज्य सरकार में मंत्री नितेश राणे ने कहा है कि अगर किसी को कोई शिकायत है तो वे सीधे सरकार से संपर्क करें
यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र में हिंदी और मराठी फिल्मों के बीच स्क्रीन स्पेस को लेकर विवाद खड़ा हुआ है।[1] लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि हिंदी फिल्मों के दबदबे के कारण मराठी सिनेमा को नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि, “सैराट” जैसी फिल्मों की भारी सफलता यह भी दर्शाती है कि अच्छी कहानी और कंटेंट वाली मराठी फिल्मों में भाषा की दीवारों को लांघकर दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता है।
इस पूरे मामले में दर्शकों की राय भी बंटी हुई है। कई लोगों का मानना है कि मल्टीप्लेक्स में सभी भाषाओं की फिल्मों को समान अवसर मिलना चाहिए, ताकि दर्शकों को अपनी पसंद की फिल्में देखने का हक मिले। यह विवाद सिर्फ दो फिल्मों के बीच का नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय सिनेमा के अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक बन गया है।






