
Breaking Today, Digital Desk : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ तनाव और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ आम हो गई हैं, दुनिया भर के लोग स्वास्थ्य और सुकून की तलाश में भारत का रुख कर रहे हैं. हज़ारों साल पुरानी आयुर्वेद और योग जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ विदेशी यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई हैं, जिससे भारत वेलनेस टूरिज्म के एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है.
यह सिर्फ़ एक छुट्टी नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को फिर से जीवंत करने का एक अनुभव है. पर्यटक अब केवल ऐतिहासिक इमारतों और खूबसूरत नज़ारों को देखने ही नहीं आते, बल्कि वे अपनी सेहत को बेहतर बनाने और मानसिक शांति पाने के लिए भी भारत की यात्रा कर रहे हैं. भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों की प्रामाणिकता और पश्चिमी देशों की तुलना में यहाँ उपचार का खर्च काफी कम होना भी एक बड़ा कारण है. यही वजह है कि विदेशी पर्यटक भारत के योग और आयुर्वेदिक रिट्रीट्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं.
भारत सरकार भी “हील इन इंडिया” जैसी पहलों के माध्यम से देश को एक वैश्विक वेल-नेस हब के रूप में बढ़ावा दे रही है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत में चिकित्सा पर्यटन का विस्तार करना है, जिसमें आयुर्वेद और योग जैसी पारंपरिक उपचार पद्धतियों का विशेष स्थान है. आंकड़ों के अनुसार, चिकित्सा और वेलनेस पर्यटन के लिए भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है. 2022 में यह संख्या 4.75 लाख थी, जो 2023 के पहले 10 महीनों में ही 5.04 लाख को पार कर गई.
उत्तराखंड में स्थित ऋषिकेश को “विश्व की योग राजधानी” के रूप में जाना जाता है, जो दुनिया भर से योग के प्रति उत्साही लोगों को आकर्षित करता है. वहीं, केरल, जिसे “भगवान का अपना देश” कहा जाता है, अपने पारंपरिक आयुर्वेदिक उपचारों और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है. इन जगहों पर मौजूद वेलनेस सेंटर्स और आयुर्वेदिक अस्पताल मेहमानों की ज़रूरत के अनुसार विशेष पैकेज भी उपलब्ध कराते हैं, जिनमें पंचकर्म थेरेपी, मसाज, और ध्यान जैसी क्रियाएँ शामिल होती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का वेलनेस टूरिज्म उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसके और भी विकसित होने की अपार संभावनाएँ हैं. यह न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है.






