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कुर्सी की ताक़त और औरत की मजबूरी…

The power of the chair and the helplessness of the woman.

Breaking Today, Digital Desk : कहते हैं कि IAS अफसर जनता की सेवा के लिए होते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में ये सेवा अक्सर ‘सेवा भाव’ से निकलकर ‘सेवा अवसर’ में बदल जाती है।

लखनऊ में बी.एल. मीणा साहब पर जो आरोप लगे हैं, वो हमारे सिस्टम की पुरानी बीमारी का ताज़ा लक्षण हैं। महिला अफसरों और संविदा कर्मियों का कहना है कि उत्पीड़न हुआ, पद का दुरुपयोग हुआ और सबूत CCTV में कैद हैं। यानी एक बार फिर वही कहानी ” कुर्सी की ताक़त और औरत की मजबूरी ”

अजी, इसमें चौंकने की क्या बात है ? अभी कुछ महीने पहले नोएडा में तैनात बड़े साहब पर भी यही इल्ज़ाम लगा था। फर्क बस इतना कि वहाँ मॉल रोड था, यहाँ रेशम विभाग।

नौकरशाही का पुराना फार्मूला है
पहले ‘जांच होगी’ का ऐलान करो।
फिर फाइलों को रेशमी रिबन में लपेटकर ठंडे बस्ते में रख दो।
जब मामला ठंडा पड़े, तो अफसर का तबादला कर दो। बस, हो गया न्याय!

जनता की याददाश्त छोटी है और अफसरों की ‘जुगाड़दाश्त’ लंबी। नतीजा ये कि कल तक जो बाबू साहब जनता को “हिसाब दो” कहते थे, आज वही खुद हिसाब देने से बचते हैं।

सवाल ये है कि आखिर ये IAS अफसर जनता के नौकर हैं या अपने अहंकार के मालिक? क्योंकि जब कुर्सी पर बैठा आदमी खुद को भगवान समझने लगे, तो सिस्टम नरक बन जाता है।

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