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अनिल कपूर को 17 थप्पड़ क्यों पड़े, परिंदा फिल्म के पीछे की अनसुनी दास्तान…

Why did Anil Kapoor get slapped 17 times, the untold story behind the movie Parinda...

Breaking Today, Digital Desk : क्या आपको याद है 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की बेहतरीन फिल्म ‘परिंदा’? अगर आपने यह फिल्म देखी है, तो आपको अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ का वो आइकॉनिक सीन जरूर याद होगा, जहाँ जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर को एक के बाद एक कई थप्पड़ मारते हैं। यह सिर्फ एक सीन नहीं था, यह फिल्म का एक बहुत ही इंटेंस और यादगार पल था जिसने दर्शकों को अंदर तक झकझोर दिया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि परदे पर जो आपको दिखा, वो सिर्फ एक्टिंग नहीं थी? अनिल कपूर को जैकी दादा (जैकी श्रॉफ) के हाथों असल में 17 बार थप्पड़ खाने पड़े थे!

जी हाँ, आपने सही सुना, 17 बार! और इसके पीछे की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प और थोड़ी सी चौंकाने वाली है। उस समय, जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर दोनों ही अपने किरदारों में पूरी तरह से डूबे हुए थे। विधु विनोद चोपड़ा, जो अपने परफेक्शन के लिए जाने जाते हैं, चाहते थे कि यह सीन एकदम असली लगे। वो नहीं चाहते थे कि कहीं से भी ये लगे कि यह सिर्फ एक एक्टिंग है।

सीन के दौरान, जैकी श्रॉफ को अनिल कपूर को थप्पड़ मारना था। विधु विनोद चोपड़ा ने जैकी श्रॉफ से कहा कि वो अनिल को “सच में” थप्पड़ मारें ताकि सीन में वो इंटेंसिटी आ सके जो वो चाहते थे। जैकी श्रॉफ थोड़े झिझके क्योंकि वो अपने दोस्त को चोट नहीं पहुँचाना चाहते थे। लेकिन विधु विनोद चोपड़ा अपनी बात पर अड़े रहे। अनिल कपूर भी सीन को परफेक्ट बनाने के लिए तैयार थे।

तो बस फिर क्या था! एक के बाद एक टेक होते गए। जैकी श्रॉफ ने हर बार अनिल कपूर को थप्पड़ मारा। कभी एक्सप्रेशन ठीक नहीं आते, कभी कैमरा एंगल, कभी कुछ और। ऐसे करते-करते अनिल कपूर को कुल 17 थप्पड़ पड़े। हर थप्पड़ के साथ अनिल कपूर का चेहरा लाल होता गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जैकी श्रॉफ भी बाद में बहुत परेशान थे कि उन्हें अपने दोस्त को इतनी बार मारना पड़ा। लेकिन उन्होंने भी निर्देशक के विजन को पूरा करने के लिए अपना बेस्ट दिया।

और नतीजा? वो सीन आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे पावरफुल और यादगार सीन्स में से एक है। ‘परिंदा’ आज भी अपनी बेहतरीन कहानी, दमदार अभिनय और लाजवाब निर्देशन के लिए याद की जाती है। जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर की दोस्ती और उनके प्रोफेशनलिज्म की यह कहानी दिखाती है कि एक बेहतरीन फिल्म बनाने के लिए कलाकार कितनी मेहनत और समर्पण दिखाते हैं। यह सिर्फ एक थप्पड़ नहीं था, यह उस मेहनत और कलाकारी का प्रतीक था जो ‘परिंदा’ को एक क्लासिक बनाती है।

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