
Breaking Today, Digital Desk : बिहार की राजनीति में आजकल एक दिलचस्प खेल चल रहा है. चुनाव अभी दूर हैं, पार्टियों ने अपने घोषणापत्र भी जारी नहीं किए हैं, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘मुफ्त’ योजनाओं की बौछार कर रहे हैं. कोई इसे चुनावी रणनीति बता रहा है, तो कोई इसे वोटरों को लुभाने की कोशिश. सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ चुनाव से पहले की घबराहट है, या नीतीश कुमार ने कोई बड़ी चाल चली है?
हाल ही में हमने देखा कि कैसे सरकार ने अलग-अलग वर्गों के लिए कई ऐलान किए. महिलाओं को सशक्त बनाने से लेकर युवाओं को रोज़गार के अवसर देने तक, और तो और कई तरह की सरकारी सेवाओं को मुफ़्त या रियायती दरों पर उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है. एक तरफ जहां विपक्ष इन कदमों को ‘रेवड़ी संस्कृति’ बताकर हमलावर है, वहीं सत्ता पक्ष इसे जनहित में लिया गया फैसला बता रहा है.
जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार हमेशा से ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले नेता रहे हैं. उनके समर्थक मानते हैं कि ये योजनाएं लोगों की भलाई के लिए हैं और समाज के कमज़ोर तबके को ऊपर उठाने में मदद करेंगी. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा यह भी कहता है कि ये सारे ऐलान ऐसे समय में हो रहे हैं जब चुनाव करीब हैं, तो इन्हें चुनावी नज़रिया से देखना भी लाज़मी है.
देखना होगा कि क्या नीतीश कुमार का यह ‘मुफ्त’ वाला दांव उन्हें आने वाले चुनावों में फायदा दिला पाएगा? क्या जनता इन घोषणाओं को सिर्फ चुनावी जुमला मानेगी या वाकई इसमें कोई भविष्य देखेगी? आने वाले समय में बिहार की राजनीति में यह ‘मुफ्त’ वाली बहस और तेज़ होती नज़र आएगी.






