
Breaking Today, Digital Desk : हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने भारत में प्रवासियों को संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी द्वारा दिए जा रहे शरणार्थी पहचान पत्रों (रिफ्यूजी कार्ड्स) पर कुछ बहुत ही तीखे सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने जानना चाहा है कि क्या भारत अब शरणार्थी कार्ड्स बांटने का एक “शो-रूम” बन गया है, जहां कोई भी आकर ऐसे कार्ड बनवा सकता है? यह टिप्पणी तब आई जब एक याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिसमें रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत से निर्वासित न करने की मांग की गई थी।
मामला क्या है?
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) की दिल्ली शाखा भारत में रह रहे कुछ अप्रवासियों को ‘शरणार्थी कार्ड’ देती है। इन कार्ड्स के जरिए उन्हें कुछ खास सुविधाएं और सुरक्षा मिल जाती है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जिन रोहिंग्याओं को निकालने की बात हो रही है, उनके पास UNHCR के शरणार्थी कार्ड हैं, इसलिए उन्हें निर्वासित नहीं किया जाना चाहिए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई। जस्टिस एम.आर. शाह और जस्टिस सी.टी. रविकुमार की बेंच ने पूछा कि क्या यह एजेंसी (UNHCR) भारत सरकार की सहमति से या भारतीय कानूनों के तहत काम कर रही है? उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि UNHCR भारत में कोई “अधिकार प्राप्त प्राधिकरण” (empowered authority) नहीं है जो किसी को शरणार्थी का दर्जा दे सके। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह के कार्ड भारत के “राष्ट्रीय हित” के खिलाफ नहीं हैं?
सरकार का रुख क्या है?
केंद्र सरकार ने पहले भी सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि रोहिंग्या गैरकानूनी अप्रवासी हैं और उन्हें वापस भेजा जाना चाहिए। सरकार का मानना है कि उनकी पहचान देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती है। अब इस नई टिप्पणी से यह बहस और तेज हो गई है कि भारत में UNHCR की भूमिका और उनके द्वारा जारी किए जाने वाले शरणार्थी कार्ड्स की वैधता क्या है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और UNHCR, दोनों को नोटिस जारी किया है और जवाब मांगा है। अब देखना होगा कि इस पर आगे क्या फैसला आता है, लेकिन एक बात साफ है कि भारत में शरणार्थी और अप्रवासियों से जुड़े मुद्दों पर एक नई और महत्वपूर्ण चर्चा शुरू हो गई है।




