
Breaking Today, Digital Desk : संसद के गलियारों में जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की गूंज सुनाई दे रही है, तब देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के भीतर एक अजीब सी खामोशी और कुछ अनकहे सवाल तैर रहे हैं. एक तरफ कांग्रेस, सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर घेरने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, तो वहीं दूसरी तरफ पार्टी के दो सबसे मुखर और अनुभवी चेहरों, शशि थरूर और मनीष तिवारी, को इस अहम बहस से बाहर रखा गया है. यह फैसला कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति है या एक ऐसी गलती जो पार्टी को ही असहज कर सकती है, इस पर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है.
मामला सिर्फ इतना नहीं है कि दो बड़े नेताओं को बोलने का मौका नहीं मिला. इसकी जड़ें उस भूमिका से जुड़ी हैं जो इन दोनों नेताओं ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद निभाई थी. दरअसल, सरकार ने जब भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग देशों में भेजे, तो थरूर और तिवारी इसका प्रमुख हिस्सा थे. वहां उन्होंने भारत की सैन्य कार्रवाई का मजबूती से समर्थन किया, जिसे राष्ट्रीय कर्तव्य के तौर पर देखा गया. लेकिन अब जब कांग्रेस पार्टी संसद में उसी ऑपरेशन के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि खुफिया चूक और अचानक संघर्ष विराम को लेकर सरकार की आलोचना कर रही है, तो इन नेताओं का पुराना स्टैंड पार्टी लाइन से मेल नहीं खाता.
इसी विरोधाभास के बीच कांग्रेस आलाकमान ने एक अनुशासित मोर्चा दिखाने की कोशिश में इन दोनों को वक्ताओं की सूची से ही बाहर कर दिया इस फैसले पर दोनों नेताओं की प्रतिक्रिया भी उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही रही. जब पत्रकारों ने शशि थरूर से इस पर सवाल किया तो उन्होंने बड़ी सहजता से “मौन व्रत” कहकर जवाब टाल दिया, जो उनकी गहरी नाराजगी और पार्टी लाइन से असहमति का प्रतीक माना जा रहा है थरूर ने स्पष्ट कर दिया है कि वे प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के तौर पर अपनाए गए रुख से पीछे नहीं हटेंगे
वहीं, मुखर सांसद मनीष तिवारी ने अपनी भड़ास निकालने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया. उन्होंने एक खबर का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए देशभक्ति गीत “भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं” की पंक्तियां पोस्ट कीं यह पोस्ट सीधे तौर पर पार्टी पर एक तंज था, जिसका मतलब साफ था कि उन्हें सच बोलने यानी ‘भारत की बात सुनाने’ से रोका जा रहा है, क्योंकि यह पार्टी की राजनीतिक लाइन के लिए असुविधाजनक है
कांग्रेस की यह कार्रवाई पार्टी के भीतर एक गहरे वैचारिक संघर्ष को भी उजागर करती है एक तरफ राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी सरकार पर तीखे और सीधे हमले की रणनीति अपना रही है. दूसरी ओर, थरूर और तिवारी जैसे नेता हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एक अधिक सधी हुई और राष्ट्रवादी लाइन का समर्थन करते हैं उन्हें चुप कराने का कदम यह संदेश देता है कि पार्टी में अब असहमति या अलग दृष्टिकोण के लिए जगह कम होती जा रही है और वफादारी को योग्यता पर तरजीح दी जा रही है
हालांकि, कांग्रेस को लगता होगा कि इससे सरकार के खिलाफ एकजुटता का संदेश जाएगा, लेकिन इसका असर उलटा होता दिख रहा है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बैठे-बिठाए कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिल गया है कि वह राष्ट्रीय हित के बजाय अपनी संकीर्ण राजनीति को प्राथमिकता देती है और अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं करती यह कदम कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है. यह न केवल पार्टी के भीतर की कलह को सड़क पर ले आया है, बल्कि जनता के बीच भी यह संदेश जाता है कि पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मसले पर भ्रमित है. अपने ही अनुभवी और विश्वसनीय चेहरों को दरकिनार करना कांग्रेस की उस छवि को और कमजोर कर सकता है, जिसे वह बनाने की कोशिश कर रही है






