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जब आधी रात को जागना था आम, नींद का वह रहस्य जो हम भूल गए…

When waking up in the middle of the night was common, the secret of sleep that we forgot

Breaking Today, Digital Desk : आज की तेज़-तर्रार दुनिया में, आठ घंटे की निर्बाध नींद को अच्छे स्वास्थ्य का पैमाना माना जाता है। लेकिन क्या होगा अगर हम कहें कि आपके पूर्वज इस तरह से नहीं सोते थे? ऐतिहासिक शोध से पता चलता है कि औद्योगिक क्रांति से पहले, लोगों का सोने का तरीका बहुत अलग था, जो आज के हमारे सोने के तरीके से बिलकुल मेल नहीं खाता। यह तरीका ‘दो शिफ्ट’ में सोने का था, जिसे खंडित या द्विखंडीय नींद (segmented or biphasic sleep) के रूप में जाना जाता है।

‘पहली नींद’ और ‘दूसरी नींद’ का दौर

इतिहासकार ए. रोजर एकरिच के अभूतपूर्व शोध के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक समाजों में लोगों के लिए रात में दो अलग-अलग चरणों में सोना आम बात थी। लोग शाम को अंधेरा होने के बाद सोने चले जाते थे, जिसे ‘पहली नींद’ (first sleep) कहा जाता था। यह नींद लगभग चार घंटे तक चलती थी।

इसके बाद, वे मध्यरात्रि के आसपास एक या दो घंटे के लिए जाग जाते थे। इस जागने की अवधि को ‘द वॉच’ (The Watch) के नाम से जाना जाता था और यह समय बेकार नहीं जाता था। इस दौरान लोग चिंतन करते, प्रार्थना करते, पढ़ते, घर के काम-काज निपटाते या अपने पड़ोसियों से मिलने भी चले जाते थे। इसके बाद, वे फिर से सोने चले जाते थे, जिसे ‘दूसरी नींद’ (second sleep) कहते थे, और यह सुबह तक चलती थी। यह पैटर्न इतना सामान्य था कि इसका उल्लेख साहित्य, अदालती रिकॉर्ड, व्यक्तिगत डायरी और पत्रों में मिलता है।

कैसे और क्यों बदला सोने का यह तरीका?

सोने के इस सदियों पुराने पैटर्न में बदलाव 19वीं सदी के अंत में औद्योगिक क्रांति और कृत्रिम प्रकाश, खासकर गैस और बाद में बिजली की रोशनी के व्यापक प्रसार के साथ शुरू हुआ। कारखानों में निश्चित काम के घंटे और रात में सड़कों और घरों में रोशनी ने लोगों की दिनचर्या बदल दी।

रात के समय को अब केवल आराम के लिए नहीं, बल्कि काम और सामाजिक गतिविधियों के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा। धीरे-धीरे, दो अलग-अलग नींद के बजाय एक ही बार में लंबी और गहरी नींद लेने का विचार आदर्श बन गया। 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक, ‘दो शिफ्ट’ में सोने की आदत लगभग पूरी तरह से गायब हो गई और आठ घंटे की निरंतर नींद एक मानक बन गई।

क्या आज भी प्रासंगिक है ‘दो शिफ्ट’ में सोना?

आधुनिक युग में, रात में जागने को अक्सर अनिद्रा जैसी नींद की बीमारी का लक्षण माना जाता है। हालांकि, कुछ शोध बताते हैं कि यह हमारे पूर्वजों से विरासत में मिली एक जैविक प्रवृत्ति हो सकती है। 1990 के दशक में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान द्वारा किए गए एक अध्ययन में, जब प्रतिभागियों को दिन में केवल 10 घंटे के लिए प्रकाश में रखा गया, तो उन्होंने स्वाभाविक रूप से दो-चरण वाली नींद के पैटर्न को अपनाना शुरू कर दिया।

हालांकि आज की जीवनशैली में दो शिफ्टों में सोना अधिकांश लोगों के लिए अव्यवहारिक है, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि नींद का एक ही “सही” तरीका नहीं हो सकता है। कुछ संस्कृतियों में आज भी दोपहर में झपकी या ‘सिएस्टा’ का चलन है, जो द्विखंडीय नींद का ही एक रूप है। इसलिए, यदि आप कभी-कभी रात के बीच में जागते हैं, तो चिंतित होने के बजाय यह याद रखना सुकून भरा हो सकता है कि आप शायद अपने शरीर की एक प्राचीन लय का अनुभव कर रहे हैं।

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