
Breaking Today, Digital Desk : जब बात डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति की आती है, तो ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा हमेशा सबसे ऊपर रहता है। उन्होंने बार-बार कहा कि उनका मकसद अमेरिका के हितों को सबसे आगे रखना है। लेकिन क्या उनकी नीतियां वाकई अमेरिका को और ताकतवर बना पाईं, या उन्होंने कुछ मुश्किल सवाल खड़े कर दिए?
ट्रंप के कार्यकाल में हमने कई बड़े नेताओं के साथ उनके रिश्तों को करीब से देखा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी दोस्ती चर्चा में रही। वहीं, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनके संबंध काफी जटिल और अप्रत्याशित रहे।
कुछ आलोचकों का मानना है कि ट्रंप ने पारंपरिक अमेरिकी गठबंधनों को कमज़ोर किया और अपने व्यक्तिगत रिश्तों को ज़्यादा महत्व दिया। उनका तर्क है कि इससे अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता पर असर पड़ा। उदाहरण के लिए, उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों से हाथ खींच लिए, जिससे दुनिया के बाकी देशों में यह संदेश गया कि अमेरिका अब पहले जैसा सहयोगी नहीं रहा।
दूसरी ओर, ट्रंप के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने अमेरिका को उन बोझिल समझौतों से आज़ाद किया जो उसके लिए फायदेमंद नहीं थे। उनका मानना है कि ट्रंप ने चीन जैसी शक्तियों के सामने मज़बूती से खड़े होकर अमेरिका के हितों की रक्षा की।
खासकर, चीन के साथ उनके व्यापार युद्ध और टैरिफ की नीतियां काफी सुर्खियां बटोरीं। कुछ लोगों ने इसे एक ज़रूरी कदम बताया, जबकि अन्य ने आगाह किया कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है।
कुल मिलाकर, ट्रंप की विदेश नीति को लेकर राय बंटी हुई है। क्या उन्होंने अमेरिका को सच में ‘महान’ बनाया या सिर्फ एक अलग रास्ता चुना? इस पर बहस चलती रहेगी। लेकिन एक बात तो तय है, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देखने का हमारा नज़रिया ज़रूर बदल दिया।






