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बिहार, जहाँ संघ के सिपाही, बिना शोर, बदल रहे हैं सियासी हवा…

Bihar, where Sangh's soldiers are silently changing the political atmosphere...

Breaking Today, Digital Desk : बिहार का मिज़ाज ही ऐसा है कि यहाँ चुनावी गहमागहमी कभी कम नहीं होती. लेकिन इस शोर-शराबे से परे, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बेहद खामोशी से ज़मीन पर अपना काम कर रहे हैं. ये हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वो स्वयंसेवक, जो अक्सर सुर्खियों से दूर रहते हैं, लेकिन जिनकी ज़मीनी पकड़ काफी मज़बूत मानी जाती है.

जब चुनावी सरगर्मियां तेज़ होती हैं, तो नेताओं के बड़े-बड़े भाषण और रैलियां ही दिखती हैं. परदे के पीछे, संघ के कार्यकर्ता गांवों-कस्बों में चुपचाप लोगों से जुड़ते हैं, उनसे बातचीत करते हैं और अपने विचारों को धीरे-धीरे फैलाते हैं. ये कोई अचानक की रणनीति नहीं है, बल्कि सालों की मेहनत और लगन का नतीजा है. इन्हें ‘संघ के फ़ुट सोल्जर’ कहना गलत नहीं होगा. ये किसी पार्टी का सीधे-सीधे प्रचार नहीं करते, बल्कि एक वैचारिक ज़मीन तैयार करते हैं. इनका काम लोगों को एकजुट करना और समाज में एक खास तरह की सोच को मज़बूती देना है.

अक्सर जब हम राजनीतिक चर्चाएं करते हैं, तो बड़े नामों और चेहरों पर ध्यान देते हैं. लेकिन बिहार के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ राजनीति का असली रंग दिखता है, वहाँ ये स्वयंसेवक घर-घर जाकर, चौपालों पर बैठकर, लोगों के सुख-दुख में शामिल होकर एक रिश्ता बनाते हैं. ये रिश्ता वोट मांगने से ज़्यादा, विश्वास बनाने का होता है. यही वजह है कि इनकी खामोश सक्रियता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

इस बार के चुनावों में भी, ऐसी उम्मीद है कि संघ के ये स्वयंसेवक अपने उसी पुराने ढर्रे पर काम कर रहे होंगे – बिना किसी दिखावे के, बिना किसी बड़े होर्डिंग के, बस लोगों के बीच रहकर, उनकी बातों को सुनकर और उन्हें अपनी बातें समझाकर. ये देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह ‘खामोश लामबंदी’ इस बार बिहार की सियासत में क्या असर डालती है. क्योंकि बिहार में अक्सर वो ही जीतता है, जो लोगों के दिलों में जगह बनाता है, और संघ इसी ‘दिल जीतने’ की रणनीति पर बरसों से काम कर रहा है.

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