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काली प्रसाद पांडे बिहार की राजनीति का एक रॉबिनहुड अध्याय समाप्त…

Kali Prasad Pandey ends a Robin Hood chapter of Bihar politics

Breaking Today, Digital Desk : बिहार की राजनीति में ‘शेर-ए-बिहार’ के नाम से मशहूर पूर्व सांसद काली प्रसाद पांडे का निधन हो गया है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। पांडे का जाना बिहार की राजनीति के एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसमें बाहुबल, रॉबिनहुड की छवि और अटूट राजनीतिक प्रभाव एक साथ देखने को मिलते थे।

गोपालगंज के रमजीता गांव से निकलकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक पहुंचने वाले काली पांडे का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1980 में गोपालगंज से विधायक बनकर की थी। हालांकि, उन्हें राष्ट्रीय पहचान 1984 के लोकसभा चुनाव से मिली, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर थी। इस लहर के बावजूद, काली पांडे ने जेल में रहते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस प्रत्याशी नगीना राय को रिकॉर्ड मतों से हराकर जीत हासिल की। इस ऐतिहासिक जीत ने उन्हें ‘शेर-ए-बिहार’ की उपाधि दिलाई।

काली प्रसाद पांडे की छवि एक बाहुबली नेता की थी, लेकिन अपने क्षेत्र में वे गरीबों और जरूरतमंदों के मददगार के तौर पर भी जाने जाते थे, जिसके चलते उन्हें ‘रॉबिनहुड’ कहा जाने लगा। यह भी कहा जाता है कि सिवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे बाहुबली नेता उन्हें अपना गुरु मानते थे। पांडे ने अपने राजनीतिक करियर में कई दलों की यात्रा की; वे कांग्रेस, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का हिस्सा रहे।

पांडे का जीवन विरोधाभासों का संगम था। एक तरफ उन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हुए, तो दूसरी तरफ वे जनता के बीच काफी लोकप्रिय रहे। उन्होंने युवावस्था में ‘जंगल पार्टी’ जैसे आपराधिक गिरोह के खिलाफ युवाओं को एकजुट किया था। हालांकि, वे 1984 की ऐतिहासिक जीत के बाद फिर कभी लोकसभा चुनाव नहीं जीत सके, जो उनके लिए एक अफसोस की बात रही। काली पांडे अपने पीछे एक ऐसी राजनीतिक विरासत छोड़ गए हैं, जिसे बिहार की राजनीति में हमेशा याद किया जाएगा।

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