
Breaking Today, Digital Desk : आजकल काम के घंटे और लाइफ़स्टाइल को लेकर खूब बातें होती हैं। कोई कहता है कि हफ़्ते में 4 दिन काम करो, तो कोई कहता है कि कम घंटों में ज़्यादा काम करो। ऐसे में, जब किसी AI स्टार्टअप का एक भारतीय कर्मचारी कहता है कि उसे 72 घंटे हफ़्ते में काम करना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं लगता, बल्कि यह बहुत फ़ायदेमंद है, तो लोग थोड़ा हैरान तो होते ही हैं!
अरे बाबा, ये कैसे संभव है?
ज़्यादातर लोगों के लिए 72 घंटे काम करना सिर्फ़ एक कल्पना है, या फिर कोई ऐसी सज़ा जो उन्हें कभी नहीं चाहिए। लेकिन इस टेकिए के लिए यह हक़ीक़त है और वह इसे खुशी-खुशी कर रहा है। उसका मानना है कि जब आप किसी ऐसे काम में लगे होते हैं, जिसमें आपको मज़ा आता है और आप दिल से कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो घंटे मायने नहीं रखते। उसे अपने स्टार्टअप के मिशन में इतना विश्वास है कि उसे यह सब “मुश्किल” लगता ही नहीं।
तो क्या ये “वर्कहॉलिक” होना है या कुछ और?
यह सिर्फ़ वर्कहॉलिक होने की बात नहीं है। यह जुनून और मकसद की बात है। जब आप किसी ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे होते हैं जो दुनिया बदल सकता है, या कम से कम आपके क्षेत्र में कुछ नया कर सकता है, तो आप ज़्यादा समय देना चाहते हैं। उसे लगता है कि इन ज़्यादा घंटों में वह ज़्यादा सीख रहा है, ज़्यादा योगदान दे रहा है और अपने करियर में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
लेकिन लाइफ़-बैलेंस का क्या?
यह एक अहम सवाल है। हर कोई इतना समर्पित नहीं हो सकता। और ज़िंदगी में काम के अलावा और भी चीज़ें होती हैं। लेकिन शायद इन टेकिए के लिए अभी करियर ही उसकी प्राथमिकता है। वह अभी अपने पैशन को फ़ुल-टाइम जी रहा है और उसे इसका कोई पछतावा नहीं है।
क्या हमें भी 72 घंटे काम करना चाहिए?
ज़रूरी नहीं। हर किसी की ज़िंदगी, प्राथमिकताएं और काम अलग होते हैं। यह कहानी सिर्फ़ यह दिखाती है कि अगर आपको अपने काम से प्यार है और आपके पास एक बड़ा विज़न है, तो आप उन चुनौतियों को भी पार कर सकते हैं जो दूसरों को असंभव लगती हैं।
यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि काम का मतलब सिर्फ़ घंटे गिनना नहीं, बल्कि कुछ ऐसा करना है जिससे आपको संतोष मिले। हो सकता है कि यह AI स्टार्टअप का कर्मचारी हमें काम और ज़िंदगी के नए मायने सिखा रहा हो।






