
Breaking Today, Digital Desk : उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और पूर्व हाईकोर्ट जज, जस्टिस ए.पी. रेड्डी, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मिले, और बस फिर क्या था, इस मुलाकात पर हंगामा खड़ा हो गया है। कई पूर्व हाई कोर्ट जजों ने इस मुलाकात को ‘गलती’ बताया है और इसे पूरी तरह से गलत ठहराया है।
अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इसमें गलत क्या है? देखिए, जब कोई व्यक्ति न्यायपालिका का हिस्सा रह चुका हो, खासकर हाई कोर्ट जैसे गरिमामय पद पर, तो उनसे कुछ उम्मीदें होती हैं। समाज में उनकी एक अलग पहचान और विश्वसनीयता होती है। ऐसे में, किसी ऐसे राजनेता से मिलना, जिन पर गंभीर आरोप हों या जो भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हों, कई सवाल खड़े करता है।
पूर्व जजों का कहना है कि न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। जब एक पूर्व जज किसी ऐसे व्यक्ति से मिलता है, खासकर जब वह खुद एक संवैधानिक पद के लिए उम्मीदवार हो, तो यह न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठा सकता है। लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या ऐसे लोगों के फैसलों में कहीं कोई दबाव या झुकाव तो नहीं था?
जस्टिस रेड्डी का तर्क हो सकता है कि यह सिर्फ एक शिष्टाचार मुलाकात थी, या व्यक्तिगत संबंध के नाते। लेकिन, सार्वजनिक जीवन में, खासकर जब आप इतने बड़े पद के लिए दावेदार हों, तो आपके हर कदम पर नज़र रखी जाती है। हर मुलाकात के अपने मायने होते हैं। एक पूर्व जज को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उनके किसी भी कार्य से न्यायपालिका की छवि को ठेस न पहुंचे।
यह सिर्फ रेड्डी साहब की बात नहीं है, यह एक व्यापक मुद्दा है। क्या एक जज या पूर्व जज को रिटायरमेंट के बाद अपनी भूमिका और सार्वजनिक छवि का ध्यान रखना चाहिए? क्या उन्हें ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखनी चाहिए, जिनसे मिलकर गलत संदेश जा सकता है? ये वो सवाल हैं, जिन पर बहस होना ज़रूरी है।
कुछ लोगों का मानना है कि रिटायरमेंट के बाद हर व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से किसी से भी मिलने का अधिकार है। लेकिन, जब आप एक ऐसे पेशे से आते हैं, जहां ईमानदारी और निष्पक्षता ही सबसे बड़ी पूंजी हो, तो कुछ सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं। इस मामले में, पूर्व जजों की आलोचना जायज़ लगती है। यह वाकई एक ‘गलती’ थी, जिससे बचा जा सकता था।






