
Breaking Today, Digital Desk : हाल ही में अनुपम खेर ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि शाहरुख खान को ‘स्वदेस’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए था। अनुपम खेर खुद एक बेहद अनुभवी और सम्मानित अभिनेता हैं, और जब ऐसे अभिनेता से ऐसी बात निकलती है, तो इसका वजन और बढ़ जाता है। यह बयान उन सभी प्रशंसकों की भावनाओं को फिर से सामने ले आया है जो सालों से यह मानते रहे हैं कि ‘स्वदेस’ में शाहरुख का प्रदर्शन राष्ट्रीय सम्मान का हकदार था।
राष्ट्रीय पुरस्कार भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक है। यह किसी भी कलाकार के लिए गर्व की बात होती है। यह सच है कि शाहरुख ने अपने करियर में कई बड़े पुरस्कार जीते हैं, लेकिन ‘स्वदेस’ जैसी फिल्म में उनके स्वाभाविक और दमदार अभिनय के लिए राष्ट्रीय पहचान मिलना शायद एक अलग ही मायने रखता।
क्या देर आए दुरुस्त आए?
अब जब सालों बाद इस मुद्दे पर फिर से बात हो रही है, तो सवाल उठता है कि क्या वाकई उस समय कुछ कमी रह गई थी? क्या उस समय के जूरी सदस्यों ने इस शानदार प्रदर्शन को नजरअंदाज कर दिया था? हालांकि, बीत चुका समय वापस नहीं आ सकता, लेकिन यह बहस हमें याद दिलाती है कि कुछ फिल्में और उनमें किए गए अभिनय कालजयी होते हैं।
‘स्वदेस’ आज भी एक ऐसी फिल्म है जिसे लोग देखना पसंद करते हैं, खासकर जब वे अपने देश से दूर होते हैं। शाहरुख खान का मोहन भार्गव का किरदार हमेशा याद किया जाएगा, चाहे पुरस्कार मिले हों या नहीं। लेकिन यह बहस उन सभी कलाकारों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है जिनके काम को शायद उस समय उतनी पहचान नहीं मिल पाती जितनी वह वास्तव में हकदार होते हैं।
‘स्वदेस’ और शाहरुख खान का अभिनय भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अनुपम खेर के बयान ने भले ही एक पुरानी बहस को फिर से छेड़ दिया हो, लेकिन यह इस बात की पुष्टि करता है कि कुछ प्रदर्शन समय की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार हो या न हो, ‘स्वदेस’ और उसमें शाहरुख का काम हमेशा हमारे दिलों में रहेगा।






