Sliderराजनीति

पीएम-सीएम बिल पर इंडिया ब्लॉक में दरार, जेपीसी की राह जुदा, विपक्ष की एकता पर उठे सवाल…

Rift in India Block over PM-CM Bill, JPC parted ways, questions raised on opposition unity

Breaking Today, Digital Desk : प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को आपराधिक मामलों में 30 दिनों तक जेल में रहने पर पद से हटाने के प्रस्तावित विवादास्पद विधेयक पर विपक्षी इंडिया गठबंधन में फूट पड़ गई है. संसद में एकजुट होकर बिल का विरोध करने वाले विपक्षी दल अब इस मामले की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में शामिल होने को लेकर दो खेमों में बंट गए हैं. तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (उद्धव गुट) ने जेपीसी का बहिष्कार करने का फैसला किया है, जबकि कांग्रेस और कुछ अन्य सहयोगी दल समिति में शामिल होकर अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं.

विपक्षी एकता में यह दरार उस समय सामने आई है जब एनडीए सरकार द्वारा लाए गए तीन विधेयकों को जांच के लिए जेपीसी को भेजा गया है. इन विधेयकों में यह प्रावधान है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार होता है और 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे 31वें दिन पद से हटा हुआ मान लिया जाएगा. विपक्ष ने इन विधेयकों को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए आरोप लगाया है कि सरकार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए ये कानून ला रही है.

जेपीसी पर क्यों बंटा विपक्ष?

तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जेपीसी को “तमाशा” करार देते हुए इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है. उनका मानना है कि समिति में सत्ता पक्ष का बहुमत होगा और विपक्ष की आवाज को अनसुना कर दिया जाएगा. आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भी कहा कि उनकी पार्टी जेपीसी में शामिल नहीं होगी क्योंकि इन विधेयकों का उद्देश्य भ्रष्टाचार खत्म करना नहीं, बल्कि विपक्षी नेताओं को फंसाना है. शिवसेना (उद्धव गुट) ने भी बहिष्कार का रास्ता चुना है.

दूसरी ओर, कांग्रेस का मानना है कि जेपीसी अपनी आलोचना और असहमति को आधिकारिक रूप से दर्ज कराने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है. कांग्रेस नेताओं को यह भी आशंका है कि अगर मुख्य विपक्षी दल जेपीसी का बहिष्कार करते हैं, तो बीजेडी, वाईएसआरसीपी और बीआरएस जैसे दल विपक्ष की खाली जगह को भरने की कोशिश कर सकते हैं. वामपंथी दल भी जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में हैं.

यह अभूतपूर्व बहिष्कार और इंडिया ब्लॉक के भीतर गहराता मतभेद विश्वास के टूटने को उजागर करता है और विपक्ष की एकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. जहां एक ओर कुछ दल इसे “दिखावा” मानकर संसदीय प्रक्रिया से दूरी बना रहे हैं, वहीं कांग्रेस इसे अपनी बात रखने का एक अवसर मान रही है, भले ही समिति का नेतृत्व एनडीए के पास हो. इस विभाजन ने सत्ता पक्ष को विपक्ष पर हमला करने का एक और मौका दे दिया है, जबकि महत्वपूर्ण विधेयकों पर एक संयुक्त विपक्षी रणनीति की आवश्यकता थी.

Related Articles

Back to top button