
Breaking Today, Digital Desk : देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी ने मालेगांव विस्फोट मामले को लेकर एक बड़ी टिप्पणी करते हुए इसे एक “झूठा मामला” करार दिया है. जेठमलानी, जो इस मामले में शुरुआत से ही बचाव पक्ष के वकील रहे हैं, ने हमेशा इस केस की बुनियाद और जांच एजेंसी की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका मानना है कि यह पूरा मामला कानूनी तौर पर कमजोर और साक्ष्यों के अभाव वाला था.
कानून के दुरुपयोग का आरोप
जेठमलानी ने शुरुआत से ही इस मामले में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) लगाए जाने का पुरजोर विरोध किया था. उन्होंने इसे राज्य सरकार द्वारा किया गया एक “दुर्भावनापूर्ण कदम” बताया था. उनके अनुसार, मकोका लगाने की अनिवार्य शर्तें, जैसे कि किसी एक आरोपी के खिलाफ पहले से कम से कम दो आरोप पत्र दाखिल होना, इस मामले में पूरी नहीं की गई थीं. बचाव पक्ष का यह भी तर्क था कि एक आरोपी के खिलाफ पुराने मामले जल्दबाजी में दर्ज किए गए ताकि मकोका को इस केस में लागू किया जा सके.
सबूतों पर उठाए गंभीर सवाल
महेश जेठमलानी ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि मामले में ठोस सबूतों का भारी अभाव था उन्होंने विशेष रूप से इस बात को उजागर किया कि पूरा मामला कुछ कमजोर कड़ियों पर आधारित था, जिसमें एक आरोपी से जुड़ी मोटरसाइकिल की कथित भूमिका के अलावा ज्यादा कुछ भी पुख्ता नहीं था बचाव पक्ष के वकीलों का यह भी कहना था कि पुलिस द्वारा दिए गए इकबालिया बयानों को छोड़कर, अभियोजन पक्ष के पास कोई स्वतंत्र और पुख्ता सबूत नहीं थे.
एक दशक से भी अधिक समय तक चले इस कानूनी संघर्ष में, जेठमलानी और उनकी टीम ने जांच एजेंसियों के हर दावे को अदालत में चुनौती दी. उनका मुख्य तर्क यह था कि इस मामले को एक विशेष एजेंडे के तहत बनाया गया था और इसमें राजनीतिक दुर्भावना भी शामिल थी. इसी कमजोर कानूनी आधार और सबूतों की कमी के कारण जेठमलानी इस मामले को एक “झूठे और गढ़े हुए केस” की संज्ञा देते हैं




