द्वारकाधीश श्रीकृष्ण मामा कंस का वध और 80 पुत्रों का विशाल परिवार…
Dwarkadish Shri Krishna kills uncle Kansa and has a huge family of 80 sons

Breaking Today, Digital Desk : भगवान श्री कृष्ण, जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं, का जीवन असाधारण घटनाओं और संबंधों से भरा हुआ है। उनका जीवन मथुरा के कारागार में जन्म से लेकर द्वारका के राजा बनने तक और अपने विशाल परिवार के पोषण तक एक विस्तृत गाथा है।
मामा कंस का संहार
श्री कृष्ण का जन्म देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में मथुरा के कारागार में हुआ था। देवकी का भाई और मथुरा का अत्याचारी शासक कंस, एक भविष्यवाणी से भयभीत था कि देवकी की आठवीं संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। इस भविष्यवाणी के डर से कंस ने देवकी और वासुदेव को बंदी बना लिया और उनकी संतानों को मारना शुरू कर दिया। हालाँकि, कृष्ण के जन्म के समय, वासुदेव ने चमत्कारिक ढंग से उन्हें यमुना पार गोकुल में नंद और यशोदा के घर पहुँचा दिया, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ। बड़े होने पर, श्री कृष्ण मथुरा लौटे और अपनी दैवीय शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए, अपने अत्याचारी मामा कंस का वध कर दिया, जिससे मथुरा के लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिली।
द्वारका से संबंध
कंस के वध के बाद, उसके ससुर, मगध के राजा जरासंध ने मथुरा पर बार-बार हमले किए। मथुरा के नागरिकों को इन निरंतर संघर्षों से बचाने के लिए, श्री कृष्ण ने अपनी प्रजा के साथ मथुरा छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने समुद्र के पश्चिमी तट पर एक भव्य और सु-नियोजित शहर की स्थापना की, जिसे द्वारका के नाम से जाना गया। यह शहर, जिसे “स्वर्ण नगरी” भी कहा जाता है, श्री कृष्ण के राज्य की राजधानी बनी, जहाँ उन्होंने कई वर्षों तक शासन किया।
अष्टभार्या और 80 पुत्र
भगवान श्री कृष्ण की आठ मुख्य रानियाँ थीं, जिन्हें ‘अष्टभार्या’ के नाम से जाना जाता है। इनके नाम हैं – रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवंती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की प्रत्येक पत्नी से उन्हें दस पुत्रों की प्राप्ति हुई। इस प्रकार, उनकी इन आठ प्रमुख पत्नियों से कुल 80 पुत्र थे। रुक्मिणी के प्रथम पुत्र का नाम प्रद्युम्न था, और जाम्बवंती से साम्ब का जन्म हुआ था। यह विशाल परिवार उनके वंश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
भगवान श्री कृष्ण का जीवन भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ उनके संबंधों, उनकी लीलाओं और महाभारत के युद्ध में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका से भी सुशोभित है, जहाँ उन्होंने अर्जुन को भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया। उनका जीवन धर्म की स्थापना और मानव जाति के कल्याण के लिए एक प्रेरणादायक आख्यान बना हुआ है।






