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आतंकी धमकियों से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल, J&K हाईकोर्ट ने कैसे दिया इसका जवाब…

The biggest question related to terrorist threats, how did the J&K High Court answer it...

Breaking Today, Digital Desk : जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि आतंकवादी धमकियों का बहाना बनाकर कोई भी अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकता. हाईकोर्ट ने एक पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी को बरकरार रखा, जिसे ड्यूटी से गैरहाजिर रहने के कारण सेवा से हटा दिया गया था. कांस्टेबल ने दावा किया था कि उसे आतंकवादियों से धमकियां मिल रही थीं, जिसकी वजह से वह ड्यूटी पर नहीं आ सका.

पूरा मामला क्या था?

दरअसल, यह मामला एक ऐसे कांस्टेबल का था, जो अपनी पोस्टिंग से लगातार गैरहाजिर था. जब उससे इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया, तो उसने तर्क दिया कि उसे आतंकवादियों से जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं. उसने अदालत में यह भी कहा कि इन धमकियों के कारण उसका परिवार भी डरा हुआ था और उसे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता थी.

हाईकोर्ट का सख्त रुख

हालांकि, हाईकोर्ट ने कांस्टेबल के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि एक पुलिसकर्मी होने के नाते, उसका प्राथमिक कर्तव्य कानून और व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. ऐसे में, अगर एक पुलिसकर्मी खुद धमकियों का हवाला देकर ड्यूटी से भाग जाएगा, तो यह सीधे तौर पर अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना होगा.

जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि “एक पुलिस अधिकारी अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से आतंकवादियों की धमकियों या किसी अन्य खतरे के कारण नहीं भाग सकता.” कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई पुलिसकर्मी ऐसी परिस्थितियों में ड्यूटी छोड़ देता है, तो वह अन्य अधिकारियों के मनोबल पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है, जो लगातार खतरों के बावजूद बहादुरी से अपना काम कर रहे हैं.

महत्वपूर्ण संदेश

यह फैसला सिर्फ एक कांस्टेबल के बारे में नहीं है, बल्कि यह उन सभी सरकारी कर्मचारियों और विशेष रूप से सुरक्षा बलों के लिए एक कड़ा और स्पष्ट संदेश है, जो चुनौतियों के बावजूद अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ड्यूटी के दौरान आने वाली कठिनाइयों या खतरों का सामना करना ही एक कर्मचारी का धर्म है, खासकर जब बात देश और जनता की सेवा की हो.

इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि जम्मू और कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी, जहां सुरक्षा चुनौतियां अधिक हैं, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण सर्वोपरि रहेंगे. यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक मिसाल कायम करेगा जो मुश्किल परिस्थितियों में अपने कर्तव्य से विमुख होने की सोचते हैं.

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