एक ढाबे की असाधारण कहानी, स्वाद, मेहनत और 100 करोड़ का सफ़र
The extraordinary story of a Dhaba Taste, hard work and the journey to Rs 100 crore

Breaking Today, Digital Desk : राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर, मुरथल में स्थित अमरीक सुखदेव ढाबा आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह सिर्फ एक ढाबा नहीं, बल्कि एक ऐसा ब्रांड बन चुका है, जिसने अपनी सादगी और स्वाद के दम पर 100 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लिया है।] हैरानी की बात यह है कि इस सफलता के पीछे न तो कोई बड़ी मार्केटिंग टीम है और न ही ज़ोमैटो या स्विगी जैसे फ़ूड डिलीवरी ऐप्स का सहारा। तो आखिर क्या है इस ढाबे की सफलता का राज़?
एक छोटे से ढाबे से 100 करोड़ के ब्रांड तक का सफ़र
इसकी कहानी 1956 में शुरू हुई थी, जब सरदार प्रकाश सिंह ने ट्रक ड्राइवरों के लिए एक छोटा सा ढाबा खोला था। उस समय यहाँ सिर्फ दाल, रोटी, सब्ज़ी और चावल जैसी बुनियादी चीज़ें मिलती थीं, और बैठने के लिए चारपाइयाँ हुआ करती थीं।1990 में, उनके बेटों, अमरीक और सुखदेव ने इस पारिवारिक व्यवसाय को संभाला और इसे एक नई दिशा दी। उन्होंने ढाबे के मेन्यू में विस्तार किया और क्वालिटी पर विशेष ध्यान दिया, जिससे यहाँ आने वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी।
बिना ताम-झाम के सफलता की कहानी
यह ढाबा आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। यहाँ की सबसे बड़ी खासियत यहाँ के स्वादिष्ट परांठे हैं, जिन्हें खाने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।[3] एक अनुमान के मुताबिक, यह ढाबा रोज़ाना 9,000 से 10,000 ग्राहकों को सेवा प्रदान करता है, जिससे रोज़ाना की कमाई लगभग 27 लाख रुपये और सालाना टर्नओवर 100 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा हो जाता है। यहाँ लगभग 500 कर्मचारी काम करते हैं, और ढाबे की ज़मीन अपनी होने के कारण किराये का कोई बड़ा खर्च भी नहीं है।
इस ढाबे की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि आपके उत्पाद में दम है और आप अपने ग्राहकों को अच्छी सेवा प्रदान करते हैं, तो आपको सफल होने के लिए किसी बड़े ताम-झाम की ज़रूरत नहीं है। अमरीक सुखदेव ढाबे को उसकी इसी खासियत के लिए दुनिया के ‘टॉप लेजेंडरी रेस्टोरेंट्स’ की सूची में भी जगह मिल चुकी है।[1] यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत, लगन और स्वाद का कोई विकल्प नहीं होता।






