
Breaking Today, Digital Desk : जैसा कि आप सब जानते हैं, विश्व कप 2023 से पहले भारतीय क्रिकेट टीम बेंगलुरु में अपने फिटनेस पर काफी ध्यान दे रही थी। लेकिन एक सवाल जो कई दिनों से क्रिकेट गलियारों में गूंज रहा है, वह यह है कि बेंगलुरु कैंप के दौरान भारतीय खिलाड़ियों का बहुचर्चित ‘ब्रोंको टेस्ट’ क्यों नहीं हुआ?
आपको याद होगा कि पिछली बार जब भी नेशनल क्रिकेट एकेडमी (NCA) में कोई बड़ा कैंप लगता था, तो ‘यो-यो टेस्ट’ के साथ ‘ब्रोंको टेस्ट’ भी फिटनेस का एक अहम हिस्सा होता था। यह टेस्ट खिलाड़ियों की स्टेमिना और फुर्ती को परखने का एक शानदार तरीका है। इसमें खिलाड़ियों को एक तय दूरी तक अलग-अलग स्प्रिंट लगाने होते हैं, और यह देखना होता है कि वे कितनी जल्दी थकते हैं और कितनी तेज़ी से रिकवर करते हैं।
इस बार, बेंगलुरु के अलूर में लगे विश्व कप कैंप में यो-यो टेस्ट तो हुआ, जिसमें सभी खिलाड़ी पास भी हो गए, लेकिन ब्रोंको टेस्ट नहीं करवाया गया। सूत्रों की मानें तो टीम मैनेजमेंट का मानना था कि लगातार क्रिकेट खेल रहे खिलाड़ियों पर इस तरह के कठिन टेस्ट का दबाव डालना ठीक नहीं होगा। विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट से ठीक पहले खिलाड़ियों को चोट से बचाने और उन्हें तरोताज़ा रखने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया।
दरअसल, भारतीय टीम के खिलाड़ी पिछले कुछ समय से लगातार व्यस्त रहे हैं। IPL, वेस्टइंडीज दौरा, एशिया कप और अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज़ – ऐसे में खिलाड़ियों की थकान को समझते हुए शायद यह फैसला लिया गया होगा। हो सकता है कि टीम मैनेजमेंट चाहता हो कि खिलाड़ी अपनी एनर्जी विश्व कप के लिए बचा कर रखें।
हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि खिलाड़ियों की फिटनेस पर कोई समझौता किया गया है। यो-यो टेस्ट एक महत्वपूर्ण पैमाना है और उसमें पास होना दर्शाता है कि खिलाड़ी अच्छी शारीरिक स्थिति में हैं। इसके अलावा, ट्रेनिंग सत्रों के दौरान भी खिलाड़ियों की फिटनेस पर लगातार नज़र रखी जाती है।
तो, फिलहाल ब्रोंको टेस्ट को लेकर कोई चिंता की बात नहीं है। टीम का फोकस इस समय खिलाड़ियों को मानसिक और शारीरिक रूप से विश्व कप के लिए तैयार करने पर है। अब देखना यह है कि क्या विश्व कप के बाद या भविष्य में किसी और कैंप में भारतीय टीम ब्रोंको टेस्ट को फिर से अपनाती है या नहीं। आपकी क्या राय है, हमें ज़रूर बताएं!






