
Breaking Today, Digital Desk : हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बयान दिया, जिसने ‘भारत में मैन्युफैक्चरिंग’ को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा था कि भारत में ज़्यादातर चीज़ें सिर्फ असेंबल (जोड़ना) की जाती हैं, बनाई नहीं जातीं। इस पर बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने तुरंत पलटवार करते हुए कुछ ठोस आंकड़े पेश किए हैं, जो उनकी बात को गलत साबित करते दिख रहे हैं।
मालवीय ने अपनी बात समझाने के लिए एक साधारण सा उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि एक घर बनाने वाला भी ईंटें, सीमेंट और बाकी चीज़ें कहीं और से खरीदता है, लेकिन घर तो वो खुद ही बनाता है। ठीक ऐसे ही, अगर कोई कंपनी कुछ पुर्जे बाहर से लाकर अपने प्रोडक्ट को भारत में असेंबल करती है, तो उसे ‘मेड इन इंडिया’ ही माना जाएगा। उनका इशारा था कि राहुल गांधी शायद ‘असेंबलिंग’ और ‘मैन्युफैक्चरिंग’ के बीच के फर्क को ठीक से नहीं समझ रहे हैं।
मालवीय ने कुछ कंपनियों के नाम और उनके भारत में बनने वाले प्रोडक्ट्स की लिस्ट भी शेयर की। जैसे:
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पेगाट्रॉन (Pegatron): ये कंपनी भारत में iPhone 12 से लेकर 15 तक बना रही है।
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फॉक्सकॉन (Foxconn): ये भी iPhone 12 से लेकर 15 तक यहीं तैयार कर रही है।
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विनस्ट्रॉन (Wistron) जिसे अब टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने खरीद लिया है: ये भी iPhone 12 से लेकर 14 तक बना रही है।
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सैमसंग (Samsung): गैलेक्सी S23 सीरीज़ भारत में बन रही है।
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डिक्सन टेक्नोलॉजीज (Dixon Technologies): ये तो ओप्पो, वीवो, श्याओमी जैसे कई ब्रांड्स के स्मार्टफोन भारत में बनाती है।
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टी.वी.एस. (TVS): कंपनी अपाचे आरटीआर 310 जैसी अपनी प्रीमियम बाइक यहीं बना रही है, जो दुनिया भर में निर्यात भी होती है।
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रॉयल एनफील्ड (Royal Enfield): उनकी बुलेट 350, क्लासिक 350 जैसी मशहूर बाइक्स भारत में ही बनती हैं।
इन सब आंकड़ों से साफ होता है कि भारत में न सिर्फ चीज़ें असेंबल हो रही हैं, बल्कि काफी कुछ बनाया भी जा रहा है। सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI)’ जैसी योजनाओं ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को काफी बढ़ावा दिया है। कई विदेशी कंपनियां अब भारत को एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर देख रही हैं।
तो क्या राहुल गांधी का बयान सिर्फ राजनीतिक हमला था या फिर उन्हें मैन्युफैक्चरिंग की सही तस्वीर की जानकारी नहीं है? अमित मालवीय के आंकड़ों को देखकर तो यही लगता है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी सिर्फ ‘असेंबली’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उससे कहीं ज़्यादा बड़ी और कामयाब है।






