
Breaking Today, Digital Desk : घर वापसी का सपना कई बार हकीकत की चट्टान से टकराकर चकनाचूर हो जाता है। विदेश में बसे एक भारतीय (NRI) के लिए यह अनुभव जिंदगी भर का नासूर बन गया। वे बेहतर भविष्य और अपनों के साथ रहने की उम्मीद लेकर भारत लौटे थे, लेकिन कोविड-19 महामारी ने उनकी जिंदगी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया, जहाँ मौत सामने खड़ी थी।
यह कहानी उस दौर की है, जब भारत कोरोना की दूसरी लहर की चपेट में था और स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई थी। भारत आने के कुछ समय बाद ही वे मामूली बुखार और साँस लेने में तकलीफ जैसी समस्या से जूझने लगे। जब तक वे कुछ समझ पाते, संक्रमण उनके फेफड़ों में बुरी तरह फैल चुका था और ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर गया।
उन्हें तुरंत अस्पताल के आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया। वह पल शायद उनकी जिंदगी का सबसे खौफनाक मंजर था। आईसीयू मरीजों से भरा था, हर तरफ बस मशीनें और दर्द से कराहते लोगों की आवाजें थीं। उस भयावह माहौल के बीच एक दिन आईसीयू के डॉक्टर ने उनके पास आकर सीधे शब्दों में कह दिया, “हम आपको शायद नहीं बचा पाएँगे।”
यह सुनना किसी भी इंसान के लिए मौत के पैगाम से कम नहीं था। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई, और उम्मीद की हर किरण बुझती नजर आई। उन्होंने उस पल को याद करते हुए साझा किया कि कैसे उस एक वाक्य ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था। यह अनुभव भारत की स्वास्थ्य सेवा के उस “अंधेरे पक्ष” को उजागर करता है, जहाँ एक डॉक्टर मरीज को हिम्मत देने की बजाय बचने की उम्मीद ही छोड़ देता है।
हालाँकि, परिवार की प्रार्थनाओं और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने मौत को मात दे दी। वे उस जंग से जीतकर बाहर आए, लेकिन यह अनुभव उनके मन पर एक गहरा घाव छोड़ गया। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की है, जिन्होंने महामारी के दौरान भारतीय स्वास्थ्य सेवा की कमजोरियों और चुनौतियों का सामना किया। यह हमें उस दौर की याद दिलाती है, जब एक-एक साँस के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था और अपने ही देश में घर लौटना एक बुरे सपने जैसा साबित हुआ।






