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क्या प्रधानमंत्री के घर के पास भी गड्ढे हैं, शिवकुमार का बेंगलुरु की सड़कों पर अजीबोगरीब बचाव…

Are there potholes near the Prime Minister's house too? Shivakumar's bizarre defence on Bengaluru roads...

Breaking Today, Digital Desk : दिल्ली की सड़कें, खासकर पीएम आवास के आसपास वाली, अक्सर अपनी चिकनी और दुरुस्त हालत के लिए जानी जाती हैं। लेकिन क्या सच में ऐसा है? हाल ही में, बेंगलुरु की सड़कों की बदहाली पर कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार का एक बयान काफी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने दिल्ली की सड़कों का हवाला दिया।

शिवकुमार ने क्या कहा?

बेंगलुरु की गड्ढे वाली सड़कों पर जब उनसे सवाल किया गया, तो शिवकुमार ने कहा कि सिर्फ बेंगलुरु ही नहीं, बल्कि दिल्ली में भी, यहां तक कि प्रधानमंत्री के निवास स्थान के करीब भी गड्ढे पाए जा सकते हैं। उनका तर्क था कि यह कोई अनोखी बात नहीं है और हर शहर में ऐसी समस्याएं होती हैं। उन्होंने कहा कि बारिश और भारी ट्रैफिक के कारण सड़कों का खराब होना एक सामान्य प्रक्रिया है।

क्या यह सच है?

दिल्ली में रहने वाले या वहां अक्सर आने-जाने वाले लोग शायद इस बात से इत्तेफाक न रखें। वीआईपी इलाकों और खासकर उन सड़कों पर जहां बड़े नेताओं का आना-जाना होता है, वहां सड़कों की हालत आमतौर पर अच्छी ही रहती है। हालांकि, दिल्ली के बाहरी इलाकों या रिहायशी कॉलोनियों में गड्ढे दिखना कोई बड़ी बात नहीं है।

बेंगलुरु की सड़कों का हाल

बेंगलुरु की सड़कें लंबे समय से लोगों के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। हर साल बारिश के मौसम में गड्ढों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे ट्रैफिक और दुर्घटनाएं दोनों बढ़ती हैं। जनता इस मुद्दे पर लगातार सरकार से सवाल करती रही है। ऐसे में शिवकुमार का यह बयान, जहां वे दिल्ली का उदाहरण देकर अपनी बात रख रहे थे, लोगों को कुछ खास पसंद नहीं आया।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने तुरंत इस बयान को आड़े हाथों लिया। उनका कहना था कि अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए ऐसे तर्क देना ठीक नहीं है। लोगों का मानना है कि सरकार को दूसरे शहरों का हवाला देने के बजाय बेंगलुरु की सड़कों को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।

क्या दिल्ली एक सही उदाहरण है?

सवाल यह उठता है कि क्या बेंगलुरु की सड़कों की तुलना दिल्ली के वीआईपी इलाकों से करना सही है? दोनों शहरों की भौगोलिक स्थिति, ट्रैफिक घनत्व और रखरखाव के तरीके अलग-अलग हैं। यह बहस अभी और लंबी चलने वाली है कि आखिर बेंगलुरु की सड़कों का उद्धार कब होगा और क्या ऐसे बयानों से जनता संतुष्ट होगी।

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