
कश्मीर की हाउसबोट में सैर का सुख तो सुना था, मगर ये “साहबों की सर्विस बोट” का नज़ारा कुछ और ही है। चमचमाती सफ़ेद चद्दरें, पैरों के नीचे हरी घास जैसे कारपेट, और ऊपर फूल-मालाओं से सजी छत लगता है मानो बाढ़ का निरीक्षण नहीं, बल्कि किसी दरबारी बारात का जुलूस निकला हो।
तख्ती पर “जिला प्रशासन उन्नाव” टांग दी गई है, ताकि कहीं ग़लतफहमी न हो जाए और लोग समझ न लें कि ये “बोट क्लब” का नया उद्घाटन है। पैरों के नीचे बाक़ायदा स्पीकर भी रखा गया है…कि अगर अचानक साहब का मन रागिनी सुनने का हो उठे या अपनी आवाज़ “बाढ़ पीड़ितों” तक दूर तक पहुँचानी हो, तो सब इंतज़ाम तैयार है।
दरअसल ये तस्वीर देखकर श्रीलाल शुक्ल का “राग दरबारी” बरबस याद आता है जहाँ निरीक्षण से ज़्यादा ज़रूरी होता है निरीक्षण का ढोल पीटना। वहाँ भी साहब लोग हर समस्या पर भाषण देकर लौट जाते थे, और यहाँ भी शायद यही दृश्य है बस फर्क इतना है कि वहाँ बैलगाड़ी थी, और अब मोटरबोट है, वहाँ गंवई गंजी थी, और अब लाइफ़ जैकेट है।
बाढ़ से जूझती जनता किनारे खड़ी है और साहब लोग ‘सुरक्षित नाव’ पर बैठकर “निरीक्षण” कर रहे हैं। अब ऐसे निरीक्षण में कीचड़ बूट पर लगे तो लगे कैसे? और जब हर बात “साहबाना ठाठ” में ढल जाए, तो राग दरबारी की वो पंक्तियाँ ही सटीक बैठती हैं
“समस्या का हल निकालना ज़रूरी नहीं,
उस पर मीटिंग करना और फ़ोटो खिंचवाना ही असली काम है।”






