
Breaking Today, Digital Desk : भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं जब नेताओं ने भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर आरोपों में गिरफ्तारी के बावजूद अपनी कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया। इन नेताओं ने नैतिक दबाव को दरकिनार करते हुए जेल से ही सरकार चलाने की कोशिश की, जिससे संवैधानिक संकट और सार्वजनिक बहस छिड़ गई। इस सूची में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर बिहार के दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव तक कई बड़े नाम शामिल हैं।
हाल के दिनों में सबसे चर्चित मामला दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का रहा है। उन्हें शराब नीति से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद भी उन्होंने लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया और तिहाड़ जेल से ही सरकार चलाने का प्रयास करते रहे। इस अभूतपूर्व स्थिति ने एक नई बहस को जन्म दिया कि क्या कोई मुख्यमंत्री जेल से सरकार चला सकता है। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिलने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया, लेकिन इस शर्त के साथ कि वे मुख्यमंत्री कार्यालय और दिल्ली सचिवालय नहीं जाएंगे।
इसी तरह का एक और मामला तमिलनाडु में देखने को मिला, जहां डीएमके सरकार में मंत्री वी. सेंथिल बालाजी को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बावजूद, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने न केवल उन्हें मंत्रिमंडल में बनाए रखा, बल्कि बिना विभाग के मंत्री का दर्जा भी दिया। इस फैसले को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच लंबा टकराव चला। काफी कानूनी और राजनीतिक खींचतान के बाद, सुप्रीम कोर्ट के दबाव में सेंथिल बालाजी को इस्तीफा देना पड़ा।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मामला भी कुछ इसी तरह का है। ईडी द्वारा जमीन घोटाले के एक मामले में गिरफ्तारी से ठीक पहले उन्होंने राजभवन जाकर मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंपा था। हालांकि, उनकी गिरफ्तारी ने राज्य में एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया था।
भारतीय राजनीति में इस प्रवृत्ति की जड़ें काफी गहरी हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ऐसे नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने और जेल जाने के बावजूद अपनी पार्टी पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। चारा घोटाला मामले में गिरफ्तारी और सजा के बाद भी वे लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और अपनी पार्टी का मार्गदर्शन करते रहे।
इन मामलों ने भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है कि क्या गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे और गिरफ्तार हो चुके नेताओं को संवैधानिक पदों पर बने रहने का नैतिक अधिकार है? इसी के चलते अब केंद्र सरकार ने एक नया विधेयक पेश किया है, जिसमें यह प्रावधान है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक आरोपों में 30 दिनों से अधिक समय तक जेल में रहता है, तो उसे अपने पद से हटा दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि यह कदम राजनीति में नैतिक मानकों को फिर से स्थापित करने और जेल से सरकार चलाने की स्थिति से बचने के लिए आवश्यक है। हालांकि, विपक्ष ने इन विधेयकों की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र और संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है।






