
Breaking Today, Digital Desk : सुप्रीम कोर्ट ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के अनुरोध पर एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश के खिलाफ की गई अपनी ही कठोर टिप्पणियों को वापस ले लिया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका इरादा न्यायाधीश को शर्मिंदा करना या उन पर कोई आक्षेप लगाना नहीं था, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखना था.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 4 अगस्त के अपने उस आदेश से दो पैराग्राफ हटा दिए, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार की आलोचना की गई थी. यह आलोचना एक दीवानी विवाद के मामले में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति देने को लेकर की गई थी. अपने पहले के आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कुमार को उनकी सेवानिवृत्ति तक आपराधिक मामलों से हटाने का निर्देश दिया था और उन्हें एक अनुभवी वरिष्ठ न्यायाधीश के साथ बैठने को कहा था.
हालांकि, इस आदेश के बाद काफी प्रतिक्रिया हुई. भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने जस्टिस पारदीवाला की पीठ को पत्र लिखकर हाईकोर्ट के जज के खिलाफ की गई कठोर टिप्पणियों पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया. इसके अतिरिक्त, इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने भी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस आदेश के जवाब में एक पूर्ण अदालत की बैठक बुलाने का अनुरोध किया था.
मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को फिर से सूचीबद्ध किया. शुक्रवार को अपने नए आदेश में, पीठ ने कहा कि वे मुख्य न्यायाधीश के अनुरोध का सम्मान करते हुए पैराग्राफ 25 और 26 को हटा रहे हैं. पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ही ‘रोस्टर के मास्टर’ होते हैं और यह मामला अब उनके विवेक पर छोड़ दिया गया है.
जस्टिस पारदीवाला ने स्पष्ट किया, “हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारी मंशा संबंधित न्यायाधीश को अपमानित करने या उन पर आक्षेप लगाने की नहीं थी.” उन्होंने आगे कहा कि न्यायपालिका एक एकीकृत संस्था है और उसकी गरिमा बनाए रखना सर्वोच्च लक्ष्य है. पीठ ने दोहराया कि जब भी कानून के शासन को प्रभावित करने वाले संस्थागत सरोकार उठते हैं, तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ता है.
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत कुमार के एक फैसले पर आपत्ति जताई थी, जिसमें उन्होंने एक दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देने की अनुमति दी थी. शीर्ष अदालत ने उस फैसले को “चौंकाने वाला” और “बेतुका” करार दिया था. अब इन टिप्पणियों को वापस लेने के साथ ही यह मामला समाप्त हो गया है.




