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तीन साल बाद जागा प्रशासन, सपा के हलफनामों पर डीएम के जवाब से गरमाई यूपी की सियासत…

Administration woke up after three years, UP politics heated up due to DM's reply on SP's affidavits

Breaking Today, Digital Desk : उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनावों में मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर दाखिल किए गए हलफनामों पर तीन साल बाद जिलाधिकारियों की ओर से जवाब आने पर एक नया राजनीतिक भूचाल आ गया है. समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को लेकर चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर जोरदार हमला बोला है. उन्होंने सीधे तौर पर सवाल उठाया है कि अगर चुनाव आयोग को हलफनामे मिले ही नहीं थे, तो अब डीएम किस बात का जवाब दे रहे हैं?

यह विवाद उस वक्त और गहरा गया जब हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने कहा था कि चुनाव आयोग को समाजवादी पार्टी की तरफ से उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर कोई हलफनामा नहीं मिला है. इस बयान के तुरंत बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर ई-रसीदें साझा करते हुए चुनाव आयोग के दावे को गलत ठहराया था.

अब, कासगंज, बाराबंकी और जौनपुर जैसे जिलों के जिलाधिकारियों (डीएम) ने उन हलफनामों पर सफाई देनी शुरू कर दी है, जिन्हें सपा ने 2022 में दाखिल किया था. इसी घटनाक्रम ने अखिलेश यादव को एक नया गोला-बारूद दे दिया है. उन्होंने इसे “तीन तिगाड़ा” यानी भाजपा सरकार, चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन का गठजोड़ करार देते हुए लोकतंत्र पर डाका डालने का आरोप लगाया है.

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “जिस तरह कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर के DM हमारे 18000 शपथपत्रों के बारे में अचानक अति सक्रिय हो गये हैं, उसने एक बात तो साबित कर दी है कि जो चुनाव आयोग कह रहा था कि ‘एफ़िडेविट की बात गलत है’ मतलब एफ़िडेविट नहीं मिले, उनकी वो बात झूठी निकली.” उन्होंने आगे सवाल किया, “अगर कोई एफ़िडेविट मिला ही नहीं, तो ये ज़िलाधिकारी लोग जवाब किस बात का दे रहे हैं? अब सतही जवाब देकर ख़ानापूर्ति करने वाले इन जिलाधिकारियों की संलिप्तता की भी जाँच होनी चाहिए.”

सपा प्रमुख ने कहा है कि या तो चुनाव आयोग गलत है या फिर डीएम. उन्होंने इस मामले में अदालत से स्वतः संज्ञान लेने की भी अपील की है. समाजवादी पार्टी का आरोप है कि 2022 के चुनावों में जानबूझकर पिछड़ों और दलित समुदाय के मतदाताओं के नाम काटे गए थे, जो कि पार्टी के पारंपरिक वोटर माने जाते हैं. पार्टी ने करीब 18,000 ऐसे मामलों के हलफनामे दाखिल करने का दावा किया था.

इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बहस छेड़ दी है. जिलाधिकारियों के देर से आए जवाबों ने चुनाव आयोग के दावों पर ही सवालिया निशान लगा दिया है, जिससे आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है

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