
Breaking Today, Digital Desk : बिहार में जातीय जनगणना को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) को साफ चेतावनी दी है कि अगर जातीय जनगणना की पूरी प्रक्रिया और उसका तरीका गैरकानूनी पाया गया, तो वह पूरी एक्सरसाइज को रद्द कर देगा। यह खबर बिहार की राजनीति में भूचाल ला सकती है, जहां जातीय जनगणना एक बड़ा मुद्दा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने ECI से पूछा है कि अगर जातीय जनगणना गैरकानूनी पाई जाती है, तो क्या इस प्रक्रिया में शामिल सभी लोगों और उनकी जानकारी को नष्ट किया जाएगा? कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि निजता का अधिकार (Right to Privacy) एक मौलिक अधिकार है और अगर जनगणना का तरीका गलत हुआ, तो यह लोगों की निजता का उल्लंघन होगा।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने चुनाव आयोग को बिहार सरकार के जवाब पर अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि अगर जनगणना गैरकानूनी घोषित की जाती है, तो इसका क्या नतीजा होगा और एकत्र किए गए डेटा का क्या किया जाएगा।
बिहार सरकार का पक्ष
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। सरकार का कहना है कि यह डेटा केवल राज्य के भीतर इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों के आधार पर योजनाएं बनाई जा सकें। सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि जातीय जनगणना का उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों की पहचान करना और उनके उत्थान के लिए नीतियां बनाना है।
आगे क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब चुनाव आयोग और बिहार सरकार, दोनों पर दबाव बढ़ गया है। चुनाव आयोग को अब सुप्रीम कोर्ट में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि ECI इस मामले पर क्या रुख अपनाता है। अगर सुप्रीम कोर्ट जनगणना की प्रक्रिया को गैरकानूनी करार देता है, तो बिहार सरकार के लिए यह एक बड़ा झटका होगा और राज्य की राजनीति में इसका बड़ा असर देखने को मिलेगा।
यह मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है और इस पर अंतिम फैसला आना बाकी है। लेकिन इतना तय है कि जातीय जनगणना का मुद्दा आने वाले समय में बिहार की राजनीति के केंद्र में बना रहेगा।




