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कहीं आप भी तो मिस नहीं कर रहे कोलकाता का वो जादू, एक दर्दनाक सच..

Kolkata's cultural fortress, is it really falling apart..

Breaking Today, Digital Desk : कोलकाता, जिसे अक्सर भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है, हमेशा से कला, साहित्य और बुद्धिजीवियों का केंद्र रहा है। लेकिन क्या यह चमक फीकी पड़ रही है? हालिया घटनाक्रम और कुछ प्रमुख हस्तियों की टिप्पणियां इस सवाल को जन्म देती हैं कि क्या कोलकाता अपना सांस्कृतिक गौरव खो रहा है।

तस्लीमा नसरीन और जावेद अख्तर की टीस

हाल ही में, जानी-मानी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने लिखा कि कैसे उन्हें अब कोलकाता में वह बौद्धिक और सांस्कृतिक माहौल नहीं मिलता, जिसके लिए शहर कभी जाना जाता था। उन्हें लगता है कि अब यहां साहित्यिक चर्चाएं, गंभीर विचार-विमर्श और कलात्मक गतिविधियां कम हो गई हैं।

इसी तरह, मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने भी एक बार कोलकाता के बारे में कुछ ऐसी ही भावनाएं व्यक्त की थीं। उन्होंने इस बात पर दुख जताया था कि शहर अपनी पुरानी साहित्यिक और कलात्मक विरासत को कहीं पीछे छोड़ता जा रहा है। उनकी टिप्पणियों ने भी इस बहस को हवा दी थी कि क्या कोलकाता का सांस्कृतिक परिदृश्य बदल रहा है।

कभी ‘कलकत्ता’ था बौद्धिकों का मक्का

एक समय था जब कलकत्ता (अब कोलकाता) केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक विचार था। यह सत्यजीत रे, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और कई अन्य दिग्गजों की कर्मभूमि थी। यहां की गलियों में साहित्यिक गोष्ठियां होती थीं, कॉफी हाउस में घंटों दर्शनशास्त्र और राजनीति पर बहस छिड़ती थी, और हर नुक्कड़ पर कला पनपती थी। यह वह शहर था जहां नए विचार जन्म लेते थे और पुरानी परंपराओं को चुनौती दी जाती थी।

आज क्या बदल गया है?

आज कोलकाता में भी अन्य बड़े शहरों की तरह भागदौड़ और आधुनिकता का बोलबाला है। मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग मॉल ने पुरानी किताबों की दुकानों और थिएटरों की जगह ले ली है। सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन ने गहरी साहित्यिक चर्चाओं को पीछे छोड़ दिया है। क्या इसका मतलब यह है कि संस्कृति मर रही है?

शायद ‘मर रही है’ कहना सही नहीं होगा, बल्कि यह बदल रही है। यह सच है कि वह पुरानी चमक शायद अब उतनी दिखाई नहीं देती, लेकिन शहर में अब भी छोटे थिएटर ग्रुप, स्वतंत्र फिल्म निर्माता, युवा कवि और कलाकार मौजूद हैं जो अपनी रचनात्मकता को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, उन्हें वह व्यापक मंच और पहचान नहीं मिल पा रही है जो उनके पूर्ववर्तियों को मिली थी।

आगे क्या?

कोलकाता के सांस्कृतिक भविष्य पर सवाल उठाना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका जवाब केवल निराशा में नहीं है। शहर को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए नए विचारों और कला रूपों को गले लगाने की जरूरत है। युवा कलाकारों को प्रोत्साहन देना, साहित्यिक आयोजनों को बढ़ावा देना और बौद्धिक विमर्श के लिए मंच तैयार करना समय की मांग है।

शायद तभी कोलकाता फिर से अपना वह सांस्कृतिक किला मजबूत कर पाएगा, जिसे अब थोड़ा दरकता हुआ महसूस किया जा रहा है।

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