QR codes on graves गुज़रे ज़माने की कहानियों को ज़िंदा रखने की एक नई पहल…
QR codes on graves, A new initiative to keep the stories of the past alive

Breaking Today, Digital Desk : केरल के एक कब्रिस्तान में अब कब्रों पर लगे पत्थर सिर्फ नाम और तारीखें ही नहीं बयां करते, बल्कि वे गुज़रे हुए लोगों की ज़िंदगियों की पूरी कहानी सुनाते हैं. एक नई और अनोखी पहल के तहत, त्रिशूर के एक चर्च के कब्रिस्तान में कब्रों पर क्यूआर कोड लगाए जा रहे हैं. इन कोड को स्कैन करते ही उस व्यक्ति की यादों का एक पूरा डिजिटल पिटारा खुल जाता है.
यह सब कुछ एक दुखद घटना के बाद शुरू हुआ. 26 साल के डॉ. इविन फ्रांसिस की 2021 में बैडमिंटन खेलते हुए अचानक मौत हो गई थी. उनके परिवार वाले, जो ओमान में रहते हैं, उनकी यादों को हमेशा के लिए संजोकर रखना चाहते थे. उन्हें लगा कि कब्र पर सिर्फ कुछ शब्द लिख देना इविन के बहुमुखी व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा
डॉ. इविन खुद तकनीक के जानकार थे और लोगों की प्रोफाइल बनाने के लिए क्यूआर कोड का इस्तेमाल किया करते थे. इसी से प्रेरित होकर, उनकी बहन एवलिन फ्रांसिस ने अपने भाई के लिए भी एक क्यूआर कोड बनाने का फैसला किया. उन्होंने दस दिनों के अंदर एक वेबसाइट तैयार की, जिसमें इविन की तस्वीरें, वीडियो, उनके कॉलेज के कार्यक्रम और दोस्तों व परिवार के साथ बिताए गए पलों को सहेजा गया.
अब, सेंट जोसेफ चर्च, कुरियाचिरा के कब्रिस्तान में डॉ. इविन की कब्र पर यह क्यूआर कोड लगा है.कोई भी व्यक्ति अपने स्मार्टफोन से इसे स्कैन करके सीधे उस वेबसाइट पर पहुंच सकता है और डॉ. इविन की ज़िंदगी के सफर को देख और महसूस कर सकता है उनके पिता वी.ए. फ्रांसिस का कहना है कि अब जब कोई इविन की कब्र पर आएगा, तो उन्हें किसी को यह बताने की ज़रूरत नहीं होगी कि इविन कैसा था; वे खुद स्कैन करके उसके जीवन के बारे में जान सकते हैं.
चर्च के पादरी, फादर थॉमस वडक्कूट ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह किसी को याद करने और समझने का एक बहुत अच्छा और अनूठा तरीका है यह पहल दर्शाती है कि कैसे तकनीक का इस्तेमाल यादों को ज़िंदा रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए किया जा सकता है. एक और मामले में, कोल्लम के वलकोम गांव में, एक परिवार ने अपनी 22 वर्षीय बेटी अखिला की याद में उसकी कब्र पर एक क्यूआर कोड लगाया है, जिसकी 2022 में बुखार से मृत्यु हो गई थी.
यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि “स्कैन करने कौन आएगा?”, लेकिन इन परिवारों के लिए यह उम्मीद और सुकून का एक ज़रिया है कि उनके प्रियजनों की कहानी सिर्फ कब्र के पत्थर तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि डिजिटल दुनिया में हमेशा ज़िंदा रहेगी.






