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हाई-टेक सिटी बेंगलुरु में गड्ढा-राज, क्या कभी खत्म होगा ये जानलेवा खेल…

Pothole-rule in hi-tech city Bengaluru, will this deadly game ever end.

Breaking Today, Digital Desk : बेंगलुरु, जिसे भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है, अपनी चमचमाती टेक कंपनियों और स्टार्टअप कल्चर के लिए जाना जाता है। लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी है जो हर शहरी के लिए सिरदर्द बनी हुई है – सड़कों पर अनगिनत गड्ढे। हर साल मानसून आते ही ये गड्ढे एक बड़ी समस्या बन जाते हैं, और इन्हें भरने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इतना पैसा खर्च होने के बाद भी इन गड्ढों से छुटकारा क्यों नहीं मिल पा रहा है?

हाई-टेक वादे और ज़मीनी हकीकत

अधिकारियों ने अक्सर इस समस्या से निपटने के लिए हाई-टेक समाधानों का हवाला दिया है। कभी “पोटहोल ट्रैकर ऐप” की बात होती है, तो कभी “स्मार्ट डामर” या “जेट पेचर” जैसी मशीनों का जिक्र होता है। ये सभी सुनने में बहुत प्रभावशाली लगते हैं, लेकिन जब आप शहर की सड़कों पर निकलते हैं, तो कहानी कुछ और ही बयां करती है। एक गड्ढा भरते ही बगल में दूसरा निकल आता है, और जो भरे जाते हैं, वे भी कुछ ही दिनों में उखड़ जाते हैं।

कहां जाता है करोड़ों का फंड?

जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन गड्ढों को ठीक करने के लिए जो करोड़ों रुपये का बजट पास होता है, वह आखिर जाता कहां है? क्या ठेकेदारों की मिलीभगत है? क्या इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता खराब है? या फिर समस्या की जड़ कहीं और है, जहां ध्यान ही नहीं जा रहा है? इन सवालों के जवाब आज तक ठीक से नहीं मिल पाए हैं, और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है – टूटी गाड़ियाँ, ट्रैफिक जाम, और जानलेवा दुर्घटनाएं।

सिर्फ गड्ढे नहीं, ये एक बड़ी समस्या है

बेंगलुरु के गड्ढे सिर्फ सड़क की सतह पर मौजूद छेद नहीं हैं। ये शहर के बुनियादी ढांचे की कमजोरियों, जवाबदेही की कमी और कुप्रबंधन का प्रतीक हैं। ये गड्ढे न केवल नागरिकों के जीवन को जोखिम में डालते हैं, बल्कि शहर की छवि को भी धूमिल करते हैं, खासकर उन विदेशी निवेशकों और पर्यटकों के सामने जो यहां आते हैं।

उम्मीद की किरण?

इस समस्या का कोई आसान समाधान नहीं है, लेकिन उम्मीद की किरण अभी भी बाकी है। जरूरत है एक मजबूत इच्छाशक्ति की, पारदर्शिता की, और दीर्घकालिक योजनाओं की। केवल तात्कालिक समाधानों से काम नहीं चलेगा। गुणवत्तापूर्ण सामग्री का उपयोग, नियमित रखरखाव, और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना ही इस समस्या से स्थायी रूप से निजात दिला सकता है। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक बेंगलुरु के गड्ढों का मायाजाल ऐसे ही करोड़ों रुपये निगलता रहेगा और शहर की रफ्तार को धीमा करता रहेगा।

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