
Breaking Today, Digital Desk : बेंगलुरु से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता पर कई सवाल खड़े करती है। भारत पेट्रोलियम के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) श्री आनंद राव को अपनी बेटी के आकस्मिक निधन के बाद जो कुछ झेलना पड़ा, वह किसी भी इंसान का दिल दहला सकता है। एक तरफ जहां उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा था, वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपनी ही बेटी के अंतिम संस्कार और संबंधित प्रक्रियाओं के लिए हर कदम पर रिश्वत देनी पड़ी।
श्री राव ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि उनकी बेटी की अचानक मौत हो गई थी। इस असहनीय पीड़ा के बावजूद, उन्हें बेटी के शव को अस्पताल से लेने से लेकर, पोस्टमॉर्टम करवाने और फिर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने तक, हर जगह “कुछ देने” के लिए कहा गया। उनका कहना है कि यह एक अंतहीन सिलसिला था जहाँ हर मोड़ पर पैसे की मांग की गई।
उन्होंने भारी मन से बताया, “मेरी बेटी को खोने का दर्द इतना बड़ा था कि उस वक्त मुझे कुछ और सूझ ही नहीं रहा था। मैं बस चाहता था कि उसकी अंतिम क्रियाएं शांति से हो जाएं। लेकिन, मुझे हर जगह, हर अधिकारी को पैसे देने पड़े। अस्पताल के स्टाफ से लेकर, पुलिस और यहाँ तक कि श्मशान घाट के कर्मचारियों तक, सबने मौका देखकर पैसे ऐंठे।”
यह घटना दर्शाती है कि हमारे समाज में भ्रष्टाचार किस कदर जड़ें जमा चुका है। एक व्यक्ति, जो पहले से ही अपने जीवन के सबसे बड़े दुख से गुजर रहा हो, उसे भी इस व्यवस्था की भेंट चढ़ना पड़ता है। श्री राव की कहानी सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की है जो ऐसे ही मजबूर हालातों में सिस्टम की बेरहमी का शिकार होते हैं। यह दिखाता है कि कैसे मानवीय संवेदनाएं पैसे के आगे बेमानी हो जाती हैं।
इस घटना के बाद सवाल उठते हैं कि क्या हमारे अधिकारी इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि वे एक शोक संतप्त परिवार की मजबूरी का भी फायदा उठाने से नहीं चूकते? यह सिर्फ एक व्यक्ति की शिकायत नहीं, बल्कि उस बड़े कैंसर का लक्षण है जो हमारे प्रशासन को अंदर से खोखला कर रहा है। उम्मीद है कि इस तरह की कहानियाँ सुनने के बाद, संबंधित विभाग इस पर संज्ञान लेंगे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। किसी भी पिता को अपनी बेटी के अंतिम संस्कार के लिए रिश्वत न देनी पड़े, यही हम सब की कामना होनी चाहिए।






