पटरी से उतरे भरोसे को वापस लाएं, रेलवे में ईमानदारी की नई शुरुआत कब होगी?

भारतीय रेलवे—देश की जीवनरेखा, करोड़ों लोगों की यात्रा का माध्यम और लाखों लोगों के रोजगार का स्रोत। लेकिन क्या यह संस्था अपने मूल आदर्शों और ज़िम्मेदारियों से भटक रही है? हाल ही में उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल में मिशन गति शक्ति प्रोजेक्ट के अंतर्गत तैनात महिला रेलकर्मी को सीबीआई द्वारा रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ना, इस सवाल को और ज़्यादा प्रासंगिक बना देता है।रेलवे जैसी संस्थाएं, जिन पर जनता का सीधा भरोसा टिका है, अगर वहां भ्रष्टाचार और घूसखोरी पनपने लगें तो इसका असर केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं, सामाजिक नैतिकता पर भी पड़ता है। बिल पास कराने के नाम पर रिश्वत मांगना एक मामूली घटना नहीं, यह उस पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवालिया निशान है जिसमें एक आम आदमी न्याय की उम्मीद लगाए बैठा होता है।, प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई एक प्रमुख योजना है जिसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे को गति देना है। ऐसे में अगर इस मिशन से जुड़े लोग ही अपनी व्यक्तिगत ‘गति’ बढ़ाने के लिए गलत रास्तों पर चलें, तो यह योजना भी अपनी दिशा खो सकती है।
क्या हम वाकई उस देश का सपना देख रहे हैं जहाँ प्रोजेक्ट्स सिर्फ कागज़ों पर तेज़ी से चलते हैं और जमीनी हकीकत में भ्रष्टाचार से पस्त होते हैं? सीबीआई की त्वरित कार्रवाई एक सकारात्मक संकेत है कि अब भ्रष्टाचार को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। लेकिन डर से नहीं, सुधार की भावना से ईमानदारी लानी होगी। यह मामला न सिर्फ दोषी को सज़ा देने का अवसर है, बल्कि पूरे रेलवे सिस्टम को पुनः आत्मावलोकन करने का मौका भी है।






