
Breaking Today, Digital Desk : याद कीजिए वो दौर, जब कांग्रेस में सीताराम केसरी का नाम उतनी ही अहमियत रखता था, जितनी आज राहुल गांधी या सोनिया गांधी का. आज शायद कम ही लोग उन्हें याद करते हैं, लेकिन बिहार की चुनावी बिसात पर, अचानक उनका नाम फिर से सुनाई देने लगा है. आखिर क्यों? क्या सच में कांग्रेस अपने पुराने दिग्गजों की विरासत को फिर से टटोल रही है, या ये बस चुनावी खुसर-पुसर है?
सीताराम केसरी, कांग्रेस के वो अध्यक्ष थे जिन्होंने शायद पार्टी के सबसे मुश्किल वक्त में कमान संभाली थी. 90 के दशक में जब कांग्रेस की हालत डांवाडोल थी, तब उन्होंने पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश की. उन्हें अक्सर एक ‘भूला हुआ अध्यक्ष’ कहा जाता है, क्योंकि उनकी छवि उतनी मज़बूत नहीं बन पाई, जितनी उनके पहले और बाद के अध्यक्षों की बनी. लेकिन राजनीति में कुछ भी बेवजह नहीं होता, और बिहार जैसे अहम राज्य में उनका नाम अचानक उठना, कई सवाल खड़े करता है.
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस, खासकर बिहार में, अपने पुराने नेताओं की विरासत को भुनाने की कोशिश कर रही है. शायद पार्टी को लगता है कि नए चेहरों से ज्यादा, पुराने और स्थापित नामों में अभी भी वो दम है जो वोटरों को आकर्षित कर सके. सीताराम केसरी का संबंध बिहार से था, और उनकी जातिगत पहचान भी वहां के समीकरणों में फिट बैठती है. ऐसे में, क्या कांग्रेस उन्हें एक बार फिर, भले ही प्रतीकात्मक रूप से, आगे कर के कुछ नया करने की सोच रही है?
यह भी मुमकिन है कि यह सिर्फ एक हवा हो, जो चुनाव के माहौल में अक्सर चलती है. विरोधी पार्टियां भी कांग्रेस को कमज़ोर दिखाने के लिए ऐसे नामों का इस्तेमाल कर सकती हैं, या कांग्रेस के अंदरूनी खेमे में भी पुरानी बातों को फिर से कुरेदा जा सकता है. लेकिन अगर इसमें थोड़ी भी सच्चाई है, तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा दांव हो सकता है.
सीताराम केसरी का कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के लिए कई अहम फैसले लिए थे. उनकी विरासत को ‘अनलॉक’ करना, जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं, कांग्रेस के लिए क्या मायने रखता है? क्या यह एक नया अध्याय होगा, या बस अतीत की धूल झाड़ने जैसा? आने वाले बिहार चुनाव के नतीजे ही बताएंगे कि सीताराम केसरी का नाम, कांग्रेस के लिए वाकई कितना ‘बज़’ पैदा करता है.






