Sliderझकझकी

प्रेम, विभाजन और किताबों की खुशबू, दिल्ली के बहरीसन्स बुकस्टोर की अनूठी…

Love, Partition and the fragrance of books: The uniqueness of Bahrisons Bookstore in Delhi

Breaking Today, Digital Desk : सन् 1955 में एक विवाह ने दिल्ली के साहित्यिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। यह कहानी है बलराज और भाग बहरी मल्होत्रा की, जिनके अटूट प्रेम और साझा जुनून ने खान मार्केट के प्रतिष्ठित बहरीसन्स बुकस्टोर की नींव रखी। उनकी यह यात्रा भारत के विभाजन की त्रासदी के बीच आशा, दृढ़ संकल्प और किताबों के प्रति प्रेम की एक मिसाल है।

विभाजन के बाद पाकिस्तान से शरणार्थी के रूप में दिल्ली आए बलराज और भाग की मुलाकात किंग्सवे कैंप में हुई थी। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, किताबों के लिए उनके जुनून ने उन्हें एक साथ ला दिया। बलराज ने 1953 में खान मार्केट में एक छोटी सी दुकान के साथ बहरीसन्स की शुरुआत की थी, जो उस समय शरणार्थियों के लिए आजीविका का एक साधन मात्र था। दो साल बाद, 1955 में बलराज और भाग विवाह के बंधन में बंध गए, और इस रिश्ते ने न केवल उनके जीवन को बल्कि उनकी दुकान को भी एक नई दिशा दी।

यह शादी महज दो दिलों का मिलन नहीं थी, बल्कि दो ऐसे सपनों का संगम थी जिन्होंने मिलकर दिल्ली में एक साहित्यिक अभयारण्य का निर्माण किया। भाग, बलराज के लिए एक स्तंभ की तरह खड़ी रहीं और दुकान के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब बलराज दोपहर के भोजन के लिए घर जाते, तो भाग कैश काउंटर संभालती थीं। बाद में, उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से जल्दी सेवानिवृत्ति ले ली ताकि वे पूरी तरह से किताबों की दुकान को अपना समय दे सकें।

उनके साझा प्रयासों और किताबों के प्रति गहरे प्रेम ने बहरीसन्स को जल्द ही दिल्ली के बुद्धिजीवियों, राजनयिकों और साहित्य प्रेमियों के लिए एक पसंदीदा अड्डा बना दिया। दशकों से, यह दुकान सिर्फ किताबें खरीदने और बेचने की जगह नहीं रही, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान, साहित्यिक चर्चाओं और अनगिनत पाठकों के लिए एक आश्रय स्थल बन गई है। आज भी बहरीसन्स बुकस्टोर उस प्रेम और दृढ़ता की कहानी कहता है जिसने विभाजन के दर्द से गुजरकर दिल्ली को एक साहित्यिक रत्न प्रदान किया।

Related Articles

Back to top button