
Breaking Today, Digital Desk : ऊंची तनख्वाह और सुनहरे भविष्य के सपनों के साथ आईटी सेक्टर में कदम रखने वाले एक युवा की कहानी आज हर उस पेशेवर की जुबान पर है जो काम के बोझ और तनावपूर्ण माहौल में पिस रहा है. दिल्ली स्थित एक बड़ी टेक कंपनी में काम करने वाले इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी आपबीती साझा की है, जिसमें उसने बताया है कि कैसे 30 लाख रुपये सालाना का आकर्षक पैकेज भी उसे मानसिक शांति नहीं दे पा रहा है और वह ‘बर्नआउट’ की स्थिति में पहुंच गया है.
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस जहरीले कॉरपोरेट कल्चर की है जो धीरे-धीरे युवाओं को अपनी चपेट में ले रहा है. महज एक साल से अधिक के अनुभव के साथ इस टेक विशेषज्ञ ने बताया कि नौकरी शुरू करने के दिन से ही वह गंभीर चिंता से जूझ रहा है. समय के साथ यह चिंता और भी बदतर होती गई, जिससे अब उसे लगातार सिरदर्द, मानसिक थकावट और हर पल काम से ऊब जाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.
उनकी आपबीती के अनुसार, काम का दबाव अत्यधिक है और त्योहारों के दिनों में भी लंबे समय तक काम करना पड़ता है. बीमार होने पर छुट्टी लेने का मतलब घर से काम करना होता है, और हाइब्रिड वर्क पॉलिसी का कोई विकल्प नहीं है. सप्ताह के पांचों दिन ऑफिस जाना अनिवार्य है, जहां का माहौल बेहद विषाक्त है.
इस युवा ने स्पष्ट किया कि उसकी समस्या वेतन को लेकर नहीं, बल्कि अपने वर्तमान और भविष्य की भलाई को लेकर है. उसने लिंक्डइन के जरिए नई नौकरी खोजने की कोशिश की, लेकिन मौजूदा जॉब मार्केट में उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली. बिना किसी दूसरी नौकरी के इस्तीफा देने का ख्याल भी उसे डराता है, क्योंकि एक स्थिर और अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी से शून्य आय पर जाना एक बड़ा कदम है.
यह मामला भारत के तेजी से बढ़ते टेक उद्योग में पेशेवरों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहे असर को उजागर करता है. कई सर्वेक्षणों ने इस बात की पुष्टि की है कि आईटी क्षेत्र में काम के लंबे घंटे और हर समय उपलब्ध रहने की संस्कृति के कारण ‘बर्नआउट’ एक प्रणालीगत संकट बन गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को इस समस्या पर ध्यान देने और एक स्वस्थ कार्य वातावरण बनाने की तत्काल आवश्यकता है.






